“कोरबा के ग्रामीण अंचलों में आज भी पंछियों की चहचहाहट,शुद्ध हवा और प्रकृति की गोद में जागती है जिंदगी”देखें यह खास वडियो
नमस्ते कोरबा :-सुबह का मतलब सिर्फ एक नए दिन की शुरुआत नहीं होता बल्कि यह उस एहसास का नाम है जो आत्मा को छू जाए। कोरबा के ग्रामीण अंचलों में आज भी यह एहसास जिंदा है जहां हर सुबह प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में लोगों का स्वागत करती है।
गांव में जैसे ही भोर होती है आसमान पर हल्की लालिमा फैलती है और ठंडी हवाएं शरीर ही नहीं मन को भी तरोताजा कर देती हैं। पेड़ों की डालियों पर बैठे पक्षी अपनी दिनचर्या में जुट जाते हैं कहीं दाना चुगते, तो कहीं घोंसलों को संवारते नजर आते हैं। इसी बीच KINGFISHER की लगातार थाप प्रकृति के इस संगीत में परिश्रम की लय जोड़ देती है। पूरे वातावरण में कोयल,मैना, गौरैया, बुलबुल सहित अनेक प्रजाति के पक्षियों की आवाज दिल को एक अलग ही सुकून देती है,
यह दृश्य सिर्फ सुंदर नहीं बल्कि जीवन का गहरा संदेश भी देता है सादगी संतुलन और मेहनत का। गांव की यह सुबह बताती है कि सुकून किसी साधन में नहीं बल्कि वातावरण और सोच में बसता है।
इसके विपरीत शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी में सुबह अब सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। न ताजी हवा का अहसास न पक्षियों की आवाज… बस समय के पीछे भागते लोग। आधुनिकता की अंधी दौड़ में शहरों ने सुविधा तो पाई लेकिन सुकून कहीं खो दिया। यह अंतर हमें सोचने पर मजबूर करता है क्या विकास का मतलब सिर्फ इमारतें और संसाधन हैं या फिर एक स्वस्थ, शांत और संतुलित जीवन भी इसका हिस्सा होना चाहिए?
आज जरूरत है कि हम गांवों की इस प्राकृतिक विरासत को सिर्फ सराहें ही नहीं बल्कि उसे सहेजें भी। क्योंकि अगर गांव की यह सुबह बची रही तो ही आने वाली पीढ़ियां असली जिंदगी का अर्थ समझ पाएंगी।
“शहर हमें जीने के साधन देते हैं, लेकिन जीना कैसे है यह आज भी गांव सिखाते हैं।”










