संडे स्पेशल :- “कोरबा की वो लड़की… जिसका नाम आज भी उसने किसी से नहीं लिया”

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संडे स्पेशल :- “कोरबा की वो लड़की… जिसका नाम आज भी उसने किसी से नहीं लिया”

नमस्ते कोरबा : कहते हैं हर आदमी की ज़िंदगी में एक ऐसा नाम ज़रूर होता है जिसे वह कभी ज़ुबान पर नहीं लाता। लेकिन उम्र के आख़िरी पड़ाव तक दिल से भी नहीं निकाल पाता। कोरबा के एक 48 वर्षीय व्यक्ति से कुछ दिन पहले मुलाक़ात हुई। बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा”क्या आपको कभी किसी से प्यार हुआ था?

वह मुस्कुराए… कुछ देर चुप रहे… फिर बोले “हुआ था… लेकिन उसे कभी पता नहीं चला।” इतना कहते ही उनकी आँखें कहीं दूर चली गईं…

शायद 30 साल पीछे… साल 1994…जब कोरबा की सड़कों पर साइकिलें ज़्यादा और गाड़ियाँ कम थीं। वह लड़का हर सुबह सरकारी स्कूल पहुँचने के लिए घर से आधा घंटा पहले निकलता था।

स्कूल जल्दी पहुँचने की वजह पढ़ाई नहीं थी… बल्कि वह लड़की थी जो रोज़ अपने पिता के साथ स्कूल आती थी। उसे बस एक बार स्कूल के गेट से अंदर जाते देख लेना… यही उसकी पूरी सुबह थी। दो साल तक दोनों एक ही क्लास में पढ़े।

एक-दूसरे का नाम जानते थे… लेकिन शायद एक-दूसरे की आवाज़ तक ठीक से नहीं सुनी थी। उन दिनों प्यार का मतलब साथ घूमना नहीं होता था। बस इतना कि अगर वह बीमार हो जाए तो अपनी कॉपी उसके घर भिजवा देना।

अगर परीक्षा में उसकी पेन बंद हो जाए तो अपनी अतिरिक्त पेन बिना कुछ कहे उसकी डेस्क पर रख देना। फिर एक दिन बोर्ड परीक्षा खत्म हुई। उसने सोचा…आज कह दूँगा। लेकिन उसी शाम पता चला… “उसके पापा का ट्रांसफर हो गया है..

अगली सुबह एक ट्रक घर का सामान लेकर निकल गया। वह बहुत देर तक सड़क किनारे खड़ा रहा। ट्रक धूल में गुम हो गया… और उसके साथ उसकी पहली मोहब्बत भी।

आज 32 साल बीत चुके हैं।वह लड़की कहाँ है… किस शहर में है… ज़िंदा भी है या नहीं…उसे कुछ नहीं पता। लेकिन जब भी वह अपने बेटे को स्कूल छोड़ने जाता है… और किसी लड़की को सफ़ेद यूनिफॉर्म में हँसते हुए देखता है… तो अनायास उसकी आँखें भर आती हैं।

उन्होंने मुझसे जाते-जाते सिर्फ़ एक बात कही “बेटा… लोग कहते हैं पहली मोहब्बत भूल जाओ। लेकिन सच यह है कि पहली मोहब्बत कभी भूलती नहीं… बस आदमी उसे याद करना छोड़ देता है।”

कोरबा में सिर्फ़ कोयला, बिजली और उद्योग ही नहीं हैं। यहाँ हज़ारों अधूरी प्रेम कहानियाँ भी दफ़्न हैं जो किसी किताब में नहीं लोगों की ख़ामोशी में लिखी हुई हैं। और शायद इसलिए… कोरबा की हवा आज भी कुछ पुराने नामों को धीरे-धीरे पुकारती है… जिन्हें सुनने वाले अब कम बचे हैं।

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