**वह बचपन वाला 15 अगस्त… जब तिरंगा, लड्डू और स्कूल की घंटी ही सबसे बड़ी खुशी थी**
नमस्ते कोरबा : 15 अगस्त का नाम सुनते ही आज भी मन अनायास ही बचपन की उन गलियों में पहुंच जाता है जहां स्वतंत्रता दिवस किसी औपचारिक आयोजन से कहीं ज्यादा खुशी और उत्साह का दिन हुआ करता था। वह दौर जब तिरंगा हाथ में लेकर स्कूल जाना राष्ट्रगान के समय सीना तानकर खड़ा होना और कार्यक्रम के बाद मिलने वाले लड्डू का इंतजार करना ही दिन की सबसे बड़ी खुशी हुआ करता था।

सुबह-सुबह मां की आवाज से नींद खुलती थी “जल्दी उठो आज स्कूल जाना है।” छुट्टी का दिन न होने के बावजूद 15 अगस्त को स्कूल जाने की उत्सुकता अलग होती थी। सफेद यूनिफॉर्म बालों को ठीक करने की कोशिश छाती पर तिरंगे का बैज और हाथ में कागज का छोटा-सा झंडा… इन छोटी-छोटी चीजों में ही बच्चों की पूरी दुनिया बसती थी।

स्कूल पहुंचते ही दोस्तों की टोली जमा हो जाती थी। किसी को भाषण देना था कोई कविता सुनाने वाला था तो कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम में सैनिक या भारत माता बनने की तैयारी में था। मैदान में कतार लगती शिक्षक बार-बार अनुशासन में खड़े होने की हिदायत देते और बच्चे कुछ देर बाद फिर धीरे से दोस्तों से बतियाने लगते।
**यादों के गलियारे में लौटता स्वतंत्रता दिवस जब देशभक्ति के मायने सरल थे और खुशियां बेहद छोटी-छोटी*
फिर आता था वह खास पल ध्वजारोहण का। जैसे ही तिरंगा आसमान की ओर उठता और फूलों की पंखुड़ियां बरसतीं पूरा मैदान तालियों और राष्ट्रगान से गूंज उठता। उस उम्र में शायद आजादी का इतिहास और उसके पीछे छिपे बलिदान की गहराई समझ में नहीं आती थी लेकिन तिरंगे को देखकर मन में उठने वाला गर्व बिल्कुल सच्चा होता था।
इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होते। देशभक्ति गीत, कविताएं, भाषण और छोटे-छोटे नाटक। मंच पर खड़ा हर बच्चा उस दिन खुद को किसी बड़े कलाकार से कम नहीं समझता था। साथियों की तालियां और शिक्षकों की शाबाशी उसके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होती थी।
लेकिन इन सबके बीच बच्चों के लिए एक और आकर्षण था **लड्डू।**
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब हाथ में छोटा-सा लड्डू मिलता तो चेहरे पर अलग ही चमक आ जाती। कोई उसे वहीं खा लेता कोई जेब में रखता और कोई घर जाकर भाई-बहन के साथ बांटने के लिए बचाकर ले जाता। उस छोटे से लड्डू में उस समय की खुशी जैसे पूरी तरह समा जाती थी।
समय बदला बचपन पीछे छूट गया स्कूल की वह यूनिफॉर्म अब अलमारी में नहीं मिलती दोस्त अपनी-अपनी जिंदगी में दूर हो गए और 15 अगस्त अब मोबाइल पर शुभकामनाओं और सोशल मीडिया पोस्ट के बीच गुजर जाता है। मगर यादों में वह दिन आज भी वैसा ही है।
आज जब तिरंगा लहराता है तो कहीं न कहीं वही बच्चा फिर जाग उठता है हाथ में कागज का झंडा लिए स्कूल के मैदान में राष्ट्रगान के दौरान सीना ताने खड़ा बच्चा।
शायद उस समय हमें आजादी की पूरी कहानी नहीं मालूम थी लेकिन **देश के प्रति सम्मान महसूस करना जरूर आता था।**
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में 15 अगस्त हमें सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान की याद नहीं दिलाता बल्कि अपने उस बचपन से भी मिलाता है जब खुशियों के लिए बहुत कुछ नहीं चाहिए था। एक तिरंगा दोस्तों की टोली स्कूल का मैदान और हाथ में मिला एक लड्डू ही काफी था।
**वक्त गुजर गया,बचपन गुजर गया, मगर वह बचपन वाला 15 अगस्त आज भी दिल में उसी शान से लहरा रहा है बिल्कुल हमारे तिरंगे की तरह।**
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