टॉप-10 की हवा और धूल में घुटता कोरबा,आंकड़ों में साफ हवा… सड़कों पर धूल-राखड़ का गुबार!

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टॉप-10 की हवा और धूल में घुटता कोरबा,आंकड़ों में साफ हवा… सड़कों पर धूल-राखड़ का गुबार!

नमस्ते कोरबा : कोरबा को देश के 10 सबसे साफ हवा वाले शहरों में जगह मिलने की खबर पढ़कर निश्चित रूप से खुशी होती है। आखिर जिस शहर की पहचान देश की बड़ी कोयला खदानों, बिजली संयंत्रों और औद्योगिक गतिविधियों से है, उसके लिए ऐसी रैंकिंग किसी उपलब्धि से कम नहीं।

लेकिन इसी खुशी के बीच जमीन से उठता एक सवाल इस उपलब्धि की चमक को थोड़ा धुंधला कर देता है अगर कोरबा की हवा इतनी साफ है तो फिर सड़कों पर उड़ता यह धूल और राखड़ का गुबार किस बात का संकेत है?

शहर की कई सड़कों से गुजरिए भारी वाहनों की आवाजाही के साथ उड़ती धूल, सड़क किनारे जमा मिट्टी और औद्योगिक इलाकों में दिखाई देने वाला राखड़ का गुबार किसी रिपोर्ट के आंकड़े का इंतजार नहीं करता। वह सीधे आंखों में जाता है कपड़ों पर जमता है और सांसों के साथ शरीर के भीतर पहुंचता है। यहां सवाल किसी संस्था या रिपोर्ट को कठघरे में खड़ा करने का नहीं है। सवाल यह है कि हवा की गुणवत्ता मापने वाले आंकड़े और आम आदमी के रोजमर्रा के अनुभव के बीच इतना अंतर क्यों दिखाई देता है?

क्या साफ हवा का पैमाना केवल एयर क्वालिटी मॉनिटर पर दिखाई देने वाला आंकड़ा है? या फिर यह भी देखा जाना चाहिए कि शहर की सड़क पर पैदल चलने वाला व्यक्ति कितनी धूल अपने साथ घर लेकर जा रहा है?

कोरबा जैसे औद्योगिक शहर में प्रदूषण की चुनौती को केवल एक आंकड़े से नहीं समझा जा सकता। उद्योग जरूरी हैं रोजगार जरूरी है, विकास जरूरी है लेकिन विकास की कीमत आम नागरिक की सांस नहीं हो सकती।

जरूरत है कि अच्छी रैंकिंग को उपलब्धि मानने के साथ-साथ शहर की उन जगहों पर भी नजर डाली जाए जहां धूल और राखड़ की समस्या लगातार दिखाई देती है। सड़कों की नियमित सफाई, पानी का छिड़काव, भारी वाहनों से उड़ने वाली धूल पर नियंत्रण, राखड़ के परिवहन और निस्तारण की प्रभावी निगरानी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के उपायों को जमीन पर मजबूती से लागू करना होगा।

क्योंकि कागज पर साफ हवा और सड़क पर उड़ती धूल दोनों एक साथ लंबे समय तक नहीं चल सकते।अगर कोरबा सच में देश के सबसे साफ हवा वाले शहरों की सूची में है तो यह दावा शहर की गलियों में भी दिखाई देना चाहिए। लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि वे साफ हवा में सांस ले रहे हैं न कि केवल किसी रिपोर्ट में पढ़ना चाहिए कि हवा साफ है।

रैंकिंग पर तालियां जरूर बजनी चाहिए, लेकिन धूल के गुबार पर आंखें बंद नहीं होनी चाहिए। कोरबा को टॉप-10 की सूची में जगह मिलने से ज्यादा जरूरत उस दिन की है, जब सड़क किनारे खड़ा आम आदमी भी बेझिझक कह सके हां अब कोरबा की हवा सचमुच साफ है।आंकड़ों की चमक अपनी जगह है, लेकिन जमीन पर प्रदूषण का सच उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

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