मां के कंधों पर सवार दिव्यांग बेटी,है एक डॉक्टर बनने का सपना,संघर्ष, ममता और उम्मीद की ऐसी कहानी, जो दिल को छू जाएगी
नमस्ते कोरबा : हर सुबह सूरज निकलता है। लोग अपने-अपने काम पर निकल पड़ते हैं। बच्चे स्कूल की ओर बढ़ते हैं। लेकिन कोरबा जिले के बलगीखार गांव में एक मां की सुबह कुछ अलग होती है।वह अपनी 80 प्रतिशत दिव्यांग बेटी को गोद में उठाती है… उसे सीने से लगाती है… और फिर स्कूल की राह पर चल पड़ती है।
यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं है। यह सफर वर्षों से जारी है
यह कोई एक-दो दिन की बात नहीं है। यह सफर वर्षों से जारी है। जिस उम्र में मां का हाथ केवल बच्चों को सहारा देता है, उस उम्र में यह मां अपनी बड़ी होती बेटी को रोज अपनी बाहों में उठाकर उसके भविष्य तक पहुंचा रही है। यह दृश्य केवल आंखों को नहीं आत्मा को भी भिगो देता है। उस बेटी का नाम है संगीता कंवर।
दसवीं बोर्ड परीक्षा में 73 प्रतिशत अंक प्राप्त किए
संगीता ने अपनी दिव्यांगता को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने दसवीं बोर्ड परीक्षा में 73 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। आज वह 11वीं जीवविज्ञान की छात्रा है और उसका एक ही सपना है डॉक्टर बनना।
वह डॉक्टर इसलिए नहीं बनना चाहती कि लोग उसे “डॉ. संगीता” कहें, बल्कि इसलिए कि वह उन लोगों के दर्द को समझती है, जो मजबूरी, बीमारी और संघर्ष के बीच जीते हैं।
लेकिन इस कहानी की असली नायिका केवल संगीता नहीं, उसकी मां भी है।
लेकिन इस कहानी की असली नायिका केवल संगीता नहीं, उसकी मां भी है। कहा जाता है कि भगवान हर जगह नहीं पहुंच सकते इसलिए उन्होंने मां बनाई। शायद इसी बात को यह मां हर दिन सच साबित करती है। उसकी गोद केवल ममता का आंचल नहीं बल्कि उसकी बेटी के सपनों की पहली एम्बुलेंस है। उसकी बाहें केवल सहारा नहीं बल्कि उस मंजिल तक पहुंचने का पुल हैं, जहां एक बेटी अपने सपनों को जीना चाहती है।आज जब समाज छोटी-छोटी सुविधाओं के अभाव में शिकायतों से भर जाता है, तब यह मां बिना किसी शिकायत के अपनी बेटी का पूरा संसार अपने कंधों पर उठाए चल रही है,
कोरबा कलेक्टर की मानवीय पहल
इस प्रेरक कहानी का एक संवेदनशील पक्ष यह भी है कि जब यह मामला कोरबा कलेक्टर के संज्ञान में पहुंचा, तो उन्होंने तत्काल मानवीय पहल करते हुए संगीता की मां को उसी विद्यालय में भृत्य के पद पर पदस्थ कराने की व्यवस्था की। इससे मां अपनी बेटी की देखभाल भी कर सकेगी और परिवार को आर्थिक संबल भी मिलेगा। वहीं विद्यालय प्रबंधन ने भी संगीता की पढ़ाई और आवश्यक सहयोग में हरसंभव मदद का भरोसा दिलाया है। यह पहल बताती है कि जब प्रशासन संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेता है, तो सरकारी व्यवस्था केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि किसी के जीवन में उम्मीद की नई किरण बन जाती है।
फिर भी संगीता की राह पूरी तरह आसान नहीं हुई है।
फिर भी संगीता की राह पूरी तरह आसान नहीं हुई है। आज भी विद्यालय आने-जाने के लिए उसकी मां को उसे गोद में उठाकर चलना पड़ता है। यदि समाज, जनप्रतिनिधि, उद्योगों की CSR इकाइयां और जिला प्रशासन मिलकर उसे एक विशेष डुअल-सीट केयरगिवर ट्राइसाइकिल उपलब्ध करा दें, तो यह केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि एक बेटी के डॉक्टर बनने के सपने को नई उड़ान देने वाला संबल होगा।
सोचिए…
यदि इस परिवार को एक डुअल-सीट केयरगिवर ट्राइसाइकिल मिल जाए, तो क्या बदल जाएगा?
केवल एक वाहन नहीं मिलेगा… एक मां के कंधों का बोझ हल्का होगा। एक बेटी की पढ़ाई आसान होगी।एक डॉक्टर बनने का सपना और मजबूत होगा। और शायद भविष्य में अनगिनत मरीजों को एक संवेदनशील चिकित्सक मिल जाएगी। यह किसी एक परिवार की मदद नहीं होगी बल्कि समाज की उस जिम्मेदारी का निर्वहन होगा जो हमें इंसान बनाती है।
हर शहर अपनी ऊंची इमारतों से नहीं बल्कि अपने बड़े दिल से पहचाना जाता है। यदि कोरबा इस बेटी के सपनों का सहारा बनता है तो यह केवल एक ट्राइसाइकिल नहीं देगा बल्कि यह संदेश देगा कि यहां सपनों को अकेला नहीं छोड़ा जाता।
आइए हम केवल प्रेरित न हों बल्कि किसी के जीवन में उम्मीद बनने का संकल्प लें।क्योंकि कभी-कभी एक छोटी-सी मदद… किसी मां की उम्रभर की तपस्या को सफल बना देती है।
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