Sunday special “कोरबा के कनकेश्वर धाम में हर साल लौटते हैं ये परिंदे… लेकिन क्या अगली बार भी आएंगे?”
नमस्ते कोरबा :- कोरबा के कनकेश्वर धाम में इन दिनों सिर्फ पक्षियों का आगमन नहीं हुआ है, बल्कि यह एक विश्वास की वापसी है। हजारों किलोमीटर दूर से एशियन ओपन बिल स्टार्क जब हर साल यहां लौटते हैं, तो वे केवल घोंसले बनाने नहीं आते वे एक अदृश्य भरोसा लेकर आते हैं कि यह धरती अब भी उनके लिए सुरक्षित है अपनापन लिए हुए है।
पेड़ों की डालियों पर सजे उनके घोंसले किसी साधारण दृश्य का हिस्सा नहीं हैं। यह उन रिश्तों की कहानी है, जो इंसान और प्रकृति के बीच बिना किसी भाषा के भी गहराई से जुड़े हुए हैं। जब ये परिंदे आसमान में उड़ते हैं, तो मानो बारिश का संदेश ही नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता का भरोसा भी साथ लेकर आते हैं।
गांव के लोग इन्हें ‘देवदूत’ कहते हैं। यह सिर्फ आस्था नहीं बल्कि अनुभव है पीढ़ियों से देखा गया सच। जैसे ही ये पक्षी आते हैं लोगों के दिलों में एक सुकून उतर आता है कि अब बारिश दूर नहीं। लेकिन शायद इन परिंदों की असली कहानी इससे कहीं ज्यादा गहरी है।
आज जब खेतों में रसायनों की मात्रा बढ़ रही है, पेड़ कट रहे हैं, और आकाशीय बिजली जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं, तब इन नन्हें मेहमानों के लिए खतरे भी उतने ही बड़े हो गए हैं। उनकी संख्या में आई कमी एक खामोश चीख है,जिसे हम सुन तो रहे हैं, पर शायद समझ नहीं पा रहे।
विडंबना देखिए जिन पक्षियों को हम शुभ संकेत मानते हैं, जिनके आने पर खुशियां मनाते हैं, उन्हीं के अस्तित्व पर हम अनजाने में चोट पहुंचा रहे हैं। वे हमारी फसलों को बचाते हैं, कीटों को खाते हैं, और बदले में सिर्फ एक सुरक्षित आसमान और कुछ पेड़ों की छांव चाहते हैं।
कनकेश्वर धाम में हर साल लौटते ये परिंदे हमें आईना दिखाते हैं। वे पूछते हैं क्या इंसान अब भी उतना ही संवेदनशील है, जितना कभी था? क्या हम सिर्फ इनकी तस्वीरें खींचने और वीडियो बनाने तक ही सीमित रह जाएंगे या इनके लिए कुछ बदलने की कोशिश भी करेंगे?
शायद वक्त आ गया है कि हम इन ‘विदेशी मेहमानों’ को मेहमान नहीं अपने घर का हिस्सा समझें। क्योंकि जिस दिन ये लौटना बंद कर देंगे, उस दिन सिर्फ एक पक्षी नहीं जाएगा हमारे जीवन से एक खूबसूरत विश्वास भी चला जाएगा।
और तब शायद बारिश तो आएगी… लेकिन वह सुकून नहीं जो इन परिंदों के साथ आता है।
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