“दस साल 3653 दिन और सेवा की अनवरत ज्योत‘भारत मां की रसोई’ बनी इंसानियत की मिसाल”
नमस्ते कोरबा :- भूख किसी धर्म, जाति, वर्ग या हैसियत को नहीं पहचानती और सच्ची सेवा भी किसी भेदभाव की मोहताज नहीं होती। कोरबा में ‘भारत मां की रसोई’ की दस वर्ष की सेवा यात्रा इसी मानवीय सोच की ऐसी मिसाल है, जिसने 3653 दिनों तक जरूरतमंदों के बीच भोजन पहुंचाकर यह साबित किया है कि समाज में संवेदनशीलता और परोपकार की भावना आज भी जीवित है।
15 अगस्त 2016 से शुरू हुई यह यात्रा 15 अगस्त 2026 को अपने दस वर्ष पूरे कर चुकी है। इन दस वर्षों में न जाने कितने मरीजों के परिजनों जरूरतमंदों और असहाय लोगों ने इस रसोई के भोजन में केवल अन्न ही नहीं, बल्कि **अपनापन, सम्मान और सहारे की भावना** भी महसूस की होगी। जिला अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले परिवारों के लिए भोजन की व्यवस्था कई बार बड़ी चुनौती बन जाती है। बीमारी के संकट के बीच जब कोई संस्था बिना किसी अपेक्षा के भोजन की थाली आगे बढ़ाती है, तो वह थाली साधारण नहीं रह जाती वह मानवता का प्रतीक बन जाती है।
आज जब समाज में सेवा के नाम पर प्रचार और प्रदर्शन का चलन बढ़ रहा है, ऐसे समय में दस वर्षों तक लगातार चलती रही यह पहल अपने आप में महत्वपूर्ण है। **सेवा की असली परीक्षा एक-दो दिन नहीं बल्कि वर्षों तक उसी भावना को बनाए रखने में होती है।** 3653 दिनों की यह निरंतरता बताती है कि ‘भारत मां की रसोई’ के पीछे केवल आयोजन की भावना नहीं, बल्कि मजबूत संकल्प और समर्पण मौजूद है।
इस यात्रा की एक और खासियत यह है कि इसके पीछे केवल संस्था के कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि वे दानदाता सहयोगी और समाजसेवी भी हैं जिन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार इस सेवा को मजबूती दी। किसी भी सामाजिक अभियान की सफलता केवल उसके संचालकों की नहीं होती उसके पीछे खड़ा पूरा समाज उसका भागीदार होता है। इसलिए 3653 दिनों की यह उपलब्धि वास्तव में **सामूहिक सेवा भावना की उपलब्धि** है।
यह पहल हमें एक बड़ा सवाल भी देती है क्या हमारे आसपास कोई व्यक्ति ऐसा तो नहीं जिसे आज भोजन की जरूरत है? यदि इस सवाल का जवाब समाज का हर सक्षम व्यक्ति अपने स्तर पर तलाशने लगे तो भूख के खिलाफ लड़ाई कहीं अधिक मजबूत हो सकती है। सरकारें अपनी योजनाओं के माध्यम से काम करती हैं, लेकिन समाज की संवेदनशील भागीदारी उन योजनाओं के बीच छूट जाने वाले लोगों तक पहुंचने का काम करती है।
‘भारत मां की रसोई’ का दस वर्ष पूरा करना इसलिए भी उल्लेखनीय है कि यह सेवा स्वतंत्रता दिवस से जुड़ी उस भावना को जीवंत करती है जिसमें देश केवल सीमाओं और व्यवस्था का नाम नहीं, बल्कि **एक-दूसरे के सुख-दुख में खड़े होने वाले लोगों का परिवार** है।
अब जब 3653 दिन पूरे हो चुके हैं असली चुनौती अगले 3653 दिनों की है। सेवा का यह सफर और लंबा हो, इसका दायरा बढ़े और समाज के अधिक से अधिक लोग इससे जुड़ें यही इस अवसर की सबसे बड़ी अपेक्षा होनी चाहिए। **एक थाली भोजन किसी की जिंदगी नहीं बदल सकती, लेकिन संकट की घड़ी में वह किसी इंसान को यह भरोसा जरूर दे सकती है कि वह अकेला नहीं है।**‘भारत मां की रसोई’ की दस वर्ष की यात्रा इसी भरोसे की कहानी है। यह केवल रसोई नहीं, बल्कि **कोरबा की धरती पर लगातार जलती वह सेवा-ज्योति है, जिसकी रोशनी जरूरतमंदों तक पहुंच रही है।**
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