Sunday special : कोसगाई पहाड़ पर स्थित मंदिर अपनी प्रचीन पुरातात्विक धरोहर के लिए के लिए विख्यात,चढ़ाया जाता है मंदिर में सफेद ध्वज

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Sunday special : कोसगाई पहाड़ पर स्थित मंदिर अपनी प्रचीन पुरातात्विक धरोहर के लिए के लिए विख्यात,चढ़ाया जाता है मंदिर में सफेद ध्वज

नमस्ते कोरबा : आमतौर पर देवी मंदिरों में लाल ध्वज फहराया जाता है, लेकिन कोसगाई देवी मंदिर ऐसा है जहां सफेद ध्वज चढ़ाया जाता है. सफेद ध्वज को शांति का प्रतीक माना जाता है. पहाड़ के ऊपर विराजमान मां कोसगाई देवी माँ का कुंवारी स्वरूप है. इसलिए भी माता को सफेद ध्वज चढ़ाया जाता है. इस मंदिर में पहुंचने वाले भक्तों को माता सुख और शांति प्रदान करती है.

जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर बालको अजगरबाहर होते हुए माता के मंदिर तक पहुंचा जा सकता है,कोसगाई पहाड़ पर स्थित मंदिर अपनी प्रचीन पुरातात्विक धरोहर के लिए के लिए विख्यात है. प्रकृति की गोद में समाया कोसगाई गढ़ अपनी प्राचीन कथाओं को समेटे जिले की प्राचीन वैभवशाली इतिहास को दर्शाता है. पुरातात्विक दृष्टि से देवी मंदिर 16 वीं शताब्दी का बताया जाता है.

छत्तीसगढ़ में छुरीगढ़ से जुड़े इस अद्वितीय मंदिर में आज भी राजघराने के लोग पूजा अनुष्ठान करने आते हैं. इस पहाड़ पर चढ़ना जितना ही कठिन लगता ऊपर चढ़ने के बाद उससे कई गुना ज्यादा सुकून मिलता है. यहां मनोकामना लेकर आने वाले हर भक्त की मुरादें देवी माँ पूरी करती है. यही कारण है कि दिन प्रतिदिन मंदिर में भक्तों की भीड़ बढ़ती जा रही है.

प्रयास के बावजूद नहीं बन पाया छत

माता खुले आसमान के नीचे पहाड़ की चोटी पर स्थित कोसगई देवी माता का दरबार खुले आसमान के नीचे लगता है. देवी माँ को खुले में प्रकृति के बीच रहना पसंद है. बावजूद इसके राजघराने के पूर्वजों ने एक बार छत बनाने का प्रयास किया था, लेकिन माता ने स्वप्न में आकर उन्हें मना कर दिया था.

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मंदिर में सेवा कार्य में जुटे मेहत्तर सिंह बताते हैं कि वे अपने परिवार की चौथी पीढ़ी है जो यहां सेवा कर रहे हैं. माता के मंदिर में छत नहीं है क्योंकि माता तपस्या में बैठी हुई है. मान्यता यह है कि देवी माँ जग कल्याण के लिए तप में लीन है. और इसी कारण से 4 महीने की सर्द ठंडी, 4 महीने की बरसात, 4 महीने गर्मी की धूप के ताप को सह रही है. अपने भक्तों के सभी कष्टों को दूर कर रही है.

कोसगई जहाँ रतनपुर के राजा ने छुपाया खजाना

सोलहवी शताब्दी में हयहयवंशी राजा बहारेन्द्र साय ने मां कोसगई मंदिर की स्थापना की थी. इन्हें ही कलचुरी राजा भी कहा जाता है. वह रतनपुर से खजाना लेकर आए थे. इस खजाने को कोसगई में छुपाया था. इस कारण इस जगह का नाम कोसगई पड़ा,”कोस” का मतलब खजाना और “गई” का मतलब घर. इसलिए कोसगई का अर्थ है खजाने का घर है. खजाने की रक्षा और क्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए कोसगई के मंदिर को स्थापित किया गया.

जरूरत है जिला प्रशासन की पहल की

मां कोसगई का मंदिर अपने आप में एक इतिहास को समेटे हुआ है जिसके संवर्धन और संरक्षण से आने वाले दिनों में इस क्षेत्र का महत्व और बढ़ जाएगा एवं पर्यटन की दृष्टि से भी कोरबा जिले के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि शहर के कोलाहल से दूर प्रकृति के गोद में बसा यह मंदिर लोगों को अपनी और आकर्षित कर रहा है,

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