“जय जवान नहीं बन सके, तो बन गए जय किसान” रिटायर्ड फौजी के बेटे ने पसीने से सींची धरती

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“जय जवान नहीं बन सके, तो बन गए जय किसान” रिटायर्ड फौजी के बेटे ने पसीने से सींची धरती

नमस्ते कोरबा :- देश सेवा का सपना हर किसी के दिल में नहीं होता, लेकिन जिनके दिल में होता है, वे किसी न किसी रूप में उसे निभा ही लेते हैं। कोरबा के नवाडीह गांव के किसान शिवशंकर सिंह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। पिता की तरह फौज में जाकर देश की सेवा करने का सपना देखा था, चयन भी हो गया था, लेकिन घर की परिस्थितियों ने उन्हें खेत की राह दिखा दी। आज वही शिवशंकर सिंह खेतों में पसीना बहाकर “जय किसान” बनकर धरती मां की सेवा कर रहे हैं।

खेत में काम करते दिखने वाले शिवशंकर सिंह का मुख्य व्यवसाय खेती है। वे बताते हैं कि साल 1990 में उनका चयन भारतीय सेना में हो गया था और वे भी अपने पिता की तरह जवान बनकर देश की सेवा करना चाहते थे। मगर घर की जिम्मेदारियों और घरेलू हालात के कारण उन्हें यह सपना अधूरा छोड़ना पड़ा।

हालांकि देश सेवा की भावना उनके भीतर आज भी जीवित है। वे कहते हैं कि “जय जवान तो नहीं बन सका, लेकिन जय किसान बनकर धरती मां की सेवा कर रहा हूं।”

दरअसल, शिवशंकर सिंह के पिता सेना से रिटायर हुए थे। रिटायरमेंट के बाद सरकार की ओर से उन्हें कोरबा ब्लॉक के नवाडीह गांव में 5 एकड़ जमीन मिली थी। यही जमीन आज उनके परिवार की आजीविका का एकमात्र सहारा है।

शिवशंकर सिंह और उनकी पत्नी इसी जमीन पर सालभर खेती करते हैं। वे धान और गेहूं के साथ-साथ तरबूज, मूंगफली, मटर और कई तरह की मौसमी सब्जियां उगाते हैं। इन फसलों से होने वाली आमदनी से परिवार का खर्च चलता है और बच्चों की पढ़ाई भी हो रही ह

खास बात यह है कि खेती के इस पूरे काम में वे मजदूरों की मदद नहीं लेते। खेत की जुताई से लेकर बुवाई, सिंचाई और कटाई तक का अधिकांश काम पति-पत्नी मिलकर ही करते हैं।

शिवशंकर सिंह उन चुनिंदा किसानों में शामिल हैं जो खरीफ के साथ-साथ रबी की फसल भी लेते हैं। सालभर खेती करने के कारण उन्हें कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन मेहनत और लगन के दम पर उनका परिवार वर्षों से खेती को ही अपना सहारा बनाए हुए है।

आमतौर पर सरकार से मिली जमीन का इस्तेमाल कई लोग खेती के बजाय अन्य कामों के लिए कर लेते हैं या उसे यूं ही खाली छोड़ देते हैं। लेकिन शिवशंकर सिंह ने बंजर पड़ी इस जमीन को अपने पसीने से ऐसा उपजाऊ बना दिया है कि अब यही जमीन सालभर अनाज और सब्जियों से भरपूर पैदावार दे रही है।

शिवशंकर सिंह की यह कहानी सिर्फ एक किसान की नहीं, बल्कि उस जज्बे की मिसाल है जो बताती है कि देश सेवा सिर्फ सीमा पर खड़े होकर ही नहीं, बल्कि खेतों में अन्न उगाकर भी की जा सकती है।

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