जनप्रतिनिधि ही बन जाएं ठेकेदार, तो शहर का विकास कौन करेगा? ठेकेदारी में बढ़ती दिलचस्पी से जनसेवा की भूमिका पर सवाल?
नमस्ते कोरबा। शहर के विकास की जिम्मेदारी संभालने वाले जनप्रतिनिधि यदि खुद ठेकेदारी और निर्माण कार्यों में दिलचस्पी लेने लगें तो विकास कार्यों की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जनता ने उन्हें सड़क, नाली, पानी और दूसरी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए चुना है लेकिन जब जनसेवा की जिम्मेदारी के साथ ठेकेदारी के हित जुड़ने लगें तो जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है।
नगर निगम क्षेत्र में हर साल करोड़ों रुपये के विकास कार्य स्वीकृत किए जाते हैं। सड़कों, नालियों और अन्य निर्माण कार्यों पर सरकारी राशि खर्च होती है। इन कार्यों की गुणवत्ता की निगरानी और गड़बड़ियों पर आवाज उठाना जनप्रतिनिधियों का दायित्व है। ऐसे में यदि वे स्वयं या उनसे जुड़े लोग निर्माण कार्यों में ठेकेदारी से जुड़े हों तो हितों के टकराव की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
शहर के कई इलाकों में आज भी सड़क, नाली और जलभराव जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। ऐसे में जरूरी है कि विकास कार्यों के टेंडर, कार्यादेश, निर्माण की गुणवत्ता और भुगतान की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। किसी भी जनप्रतिनिधि की ठेकेदारी से जुड़ी भूमिका सामने आने पर तथ्यों के आधार पर उसकी जांच होनी चाहिए।
जनप्रतिनिधि का मूल दायित्व जनता की समस्याएं उठाना और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करना है। यदि वही ठेकेदारी में उलझेंगे तो निर्माण कार्यों की निगरानी और जवाबदेही का जिम्मा कौन संभालेगा?
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