“बालू नहीं आस्था से गढ़े जाते हैं भोलेनाथ… दर्री रोड में हर सावन साकार होता है शिव का स्वरूप”
नमस्ते कोरबा :- सावन आते ही कोरबा की फिजाओं में भगवान भोलेनाथ की भक्ति घुल जाती है। मंदिरों में जलाभिषेक के लिए कतारें लगती हैं, शिवालयों में हर-हर महादेव की गूंज सुनाई देती है। लेकिन शहर के दर्री रोड ओवरब्रिज के नीचे शिवभक्ति की एक ऐसी तस्वीर देखने को मिल रही है जो सादगी में भी बेहद खास है।
मेहनत करने वाले हाथ जब बनाते हैं भोलेनाथ
दिनभर वाहनों की आवाजाही, माल ढुलाई और रोजमर्रा के काम में व्यस्त रहने वाले चालक और हमाल सावन आते ही अपनी व्यस्तता के बीच भगवान शिव के लिए समय निकालते हैं। मिलकर बालू जुटाते हैं और श्रद्धा से शिवलिंग का निर्माण करते हैं।
शिवलिंग तैयार होने के बाद यहां पूरे सावन विधि-विधान से पूजा-अर्चना और जलाभिषेक किया जाता है। सावन सोमवार के दिन तो माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु बेलपत्र, फूल और जल अर्पित कर भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं।
व्यापारियों का सहयोग, श्रमिकों की श्रद्धा
इस धार्मिक परंपरा में दरी रोड के व्यापारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। चालक-हमालों की इस आस्था को आगे बढ़ाने के लिए व्यापारी हर साल अपनी ओर से सहयोग करते हैं। किसी की ओर से पूजा सामग्री की व्यवस्था होती है तो कोई अन्य जरूरतों में सहयोग करता है। इस तरह यह शिवलिंग केवल बालू से नहीं, बल्कि श्रमिकों की श्रद्धा और व्यापारियों के सहयोग से तैयार होता है।
न भव्य मंदिर, न दिखावा… बस सच्ची श्रद्धा
दर्री रोड का यह शिवलिंग एक संदेश भी देता है भगवान शिव की भक्ति के लिए भव्यता नहीं भाव चाहिए। जिन हाथों में दिनभर मेहनत की लकीरें दिखाई देती हैं, उन्हीं हाथों से जब बालू का शिवलिंग आकार लेता है तो वह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि श्रम आस्था और सामूहिक विश्वास का स्वरूप बन जाता है। सावन के पूरे महीने यहां होने वाली पूजा यही एहसास कराती है कि भोलेनाथ के दरबार में आस्था की कीमत नहीं होती। बालू का एक कण भी श्रद्धा से चढ़े तो वह शिवमय हो जाता है।
दरी रोड ओवरब्रिज के नीचे बना यह बालू का शिवलिंग इन दिनों कोरबा में सावन की उस सादगीपूर्ण आस्था की पहचान बना हुआ है, जहां श्रमिकों के हाथ व्यापारियों का सहयोग और श्रद्धालुओं का विश्वास मिलकर हर साल भोलेनाथ का स्वरूप गढ़ता है।









