जब बगीचा बन गया गणित की किताब, पौधे सिखा रहे सूत्र और क्यारियां क्षेत्रफल,कोरबा के स्याहीमुड़ी सरकारी स्कूल में अनूठा नवाचार,देखिए यह खास खबर
नमस्ते l कोरबा। गणित का नाम सुनते ही कई बच्चों के माथे पर बल पड़ जाता है। सूत्र, कोण, क्षेत्रफल और माप की गणना उन्हें कठिन लगती है। लेकिन कोरबा के स्याहीमुड़ी स्थित शासकीय हाई स्कूल में गणित अब न तो सिर्फ ब्लैकबोर्ड तक सीमित है और न ही कॉपी के पन्नों तक।
यहां स्कूल का उद्यान ही बच्चों के लिए ‘मैथ्स गार्डन’ बन गया है। क्यारियों की आकृतियां, पौधों की ऊंचाई-मोटाई और रास्तों की दूरी अब गणित के सवालों को समझने का जरिया बन चुके हैं।
स्कूल की प्राचार्य और शिक्षिका के नवाचार से तैयार किए गए इस मैथ्स गार्डन में क्यारियों को **त्रिकोण, आयत और गोलाकार** जैसी अलग-अलग आकृतियां दी गई हैं। इन आकृतियों की लंबाई, चौड़ाई, त्रिज्या और दूरी को मापकर बच्चे खुद क्षेत्रफल और परिमाप निकाल रहे हैं। यानी जिस गणित को बच्चे कक्षा में बैठकर कठिन समझते थे, वही गणित अब उन्हें अपने आसपास की चीजों में दिखाई देने लगा है।
**क्यारी बनी ब्लैकबोर्ड, पौधों पर टंगे गणित के सूत्र**
मैथ्स गार्डन की खासियत सिर्फ क्यारियों की आकृतियां नहीं हैं। यहां लगाए गए पौधों के बीच गणित से जुड़े अलग-अलग सूत्र भी प्रदर्शित किए गए हैं। बच्चे पौधों को देखते हुए सूत्र पढ़ते हैं और फिर उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल करके समझते हैं।
किसी क्यारी की लंबाई-चौड़ाई मापकर उसका क्षेत्रफल निकालना हो या गोलाकार क्यारी की त्रिज्या के आधार पर गणना करनी हो, बच्चों के लिए यह सब अब किताब के सवाल नहीं बल्कि आंखों के सामने मौजूद गतिविधियां हैं। क्यारियों के बीच बनी सड़क की चौड़ाई और उनके बीच की दूरी भी बच्चे खुद मापकर गणितीय अवधारणाओं को समझ रहे हैं।
**व्याख्याता प्रभा साव** के अनुसार इस पहल का उद्देश्य गणित को बच्चों के लिए आसान और रुचिकर बनाना है। जब बच्चे खुद मापते और गणना करते हैं तो उन्हें सूत्र रटने की जरूरत कम पड़ती है और विषय लंबे समय तक याद रहता है।
**जिस गणित से भागते थे, अब उसी में दिखा रहे दिलचस्पी**
मैथ्स गार्डन का असर बच्चों की रुचि में भी दिखाई दे रहा है। जिन विद्यार्थियों को गणित कठिन लगता था, वे अब गतिविधियों के माध्यम से इसे समझने में दिलचस्पी ले रहे हैं। यहां सीखना केवल किताब और कॉपी तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चे **देखकर, छूकर, मापकर और गणना करके** सीख रहे हैं।
स्कूल में गठित **इको क्लब** भी इस पहल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उद्यान के माध्यम से बच्चों को पौधों की देखभाल, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की जानकारी तो मिल ही रही थी, अब उसी स्थान को गणित की प्रयोगशाला का रूप देकर पाठ्यक्रम को भी इससे जोड़ दिया गया है।
विद्यार्थी **आरुषि तामरे** बताती हैं कि पहले गणित के कई सवाल समझने में मुश्किल होती थी, लेकिन गार्डन में क्यारियों को मापकर क्षेत्रफल निकालने से गणना को समझना आसान हो गया है।
**कम संसाधन में बड़ा प्रयोग**
इस नवाचार की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए किसी बड़े बजट या अत्याधुनिक संसाधन की जरूरत नहीं पड़ी। स्कूल प्रबंधन ने उपलब्ध संसाधनों और उद्यान का बेहतर उपयोग करते हुए इसे सीखने के नए माध्यम में बदल दिया।
स्कूलों को समग्र शिक्षा के तहत मिलने वाली राशि का उपयोग उद्यान के विकास और शैक्षणिक गतिविधियों में किया जा सकता है। इसी सोच के साथ स्कूल प्रबंधन ने उद्यान को केवल सजावटी स्थान न बनाकर **जीवंत प्रयोगशाला** का स्वरूप दिया।
प्राचार्य **फरहाना अली** का कहना है कि जिले में इस तरह का प्रयोग पहली बार किया गया है। उनका मानना है कि स्कूलों में उपलब्ध छोटे-छोटे संसाधनों का रचनात्मक इस्तेमाल कर बच्चों को कठिन विषय भी आसानी से समझाए जा सकते हैं।
**अब किताब से बाहर निकलकर जमीन पर उतर रहा गणित**
मैथ्स गार्डन ने यह साबित किया है कि पढ़ाई के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। जरूरत है तो बस सीखने के तरीके में बदलाव की। जिस गणित को बच्चे अब तक किताब के पन्नों और ब्लैकबोर्ड पर देखते थे, वह अब उनके सामने **क्यारी, पौधे, सड़क और माप की फीते** में नजर आ रहा है।
यह पहल बच्चों को एक साथ दो पाठ पढ़ा रही है**गणित की गणना और प्रकृति की रक्षा।** यही इस सरकारी स्कूल के मैथ्स गार्डन की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
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