Sunday special : एक पुल नहीं… बचपन का सवाल है! मुड़धोवा के बच्चों से पूछिए, विकास के दावों और हकीकत के बीच कितनी गहरी खाई है…
नमस्ते कोरबा :- कोरबा को देश की ऊर्जा नगरी कहा जाता है। यहां की खदानों से निकलने वाला कोयला देश को रोशन करता है। करोड़ों रुपये की परियोजनाएं, विशाल उद्योग और विकास के बड़े-बड़े दावे इस जिले की पहचान हैं। लेकिन इन्हीं दावों के बीच एक गांव ऐसा भी है *जहां बच्चों की पढ़ाई का पहला सबक किताबों से नहीं बल्कि अपनों से बिछड़ने की मजबूरी से शुरू होता है*
चुइया पंचायत का मुड़धोवा आज भी उस विकास का इंतजार कर रहा है जिसकी बातें हर चुनाव में होती हैं, हर बजट में होती हैं लेकिन जो कभी गांव तक नहीं पहुंचता।
बारिश आते ही परसाखोला नाला उफान पर आ जाता है। गांव चारों ओर से कट जाता है पगडंडियां कीचड़ में बदल जाती हैं और मुड़धोवा एक टापू बनकर रह जाता है। गांव में पांचवीं तक स्कूल है लेकिन उसके बाद पढ़ाई के लिए बच्चों को नाला पार कर दूसरे गांव जाना पड़ता है। बरसात में यह सफर किसी परीक्षा से कम नहीं होता।
ऐसे में अभिभावकों के सामने एक ऐसा फैसला खड़ा होता है, जिसे कोई मां-बाप अपनी इच्छा से कभी नहीं लेना चाहेंगे। या तो बच्चों की पढ़ाई छुड़वा दें… या फिर उन्हें अपने से दूर भेज दें।
और यहीं से शुरू होती है मुड़धोवा की सबसे बड़ी त्रासदी।
जिस उम्र में बच्चे मां की गोद में सिर रखकर सोते हैं पिता की उंगली पकड़कर स्कूल जाते हैं उसी उम्र में वे छात्रावासों और रिश्तेदारों के घरों में रहने को मजबूर हो जाते हैं। मां की ममता और पिता का साया पीछे छूट जाता है क्योंकि सरकार एक पुल नहीं बना सकी।
गांव की गलियां इसलिए सूनी नहीं हैं कि लोग शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। वे इसलिए सूनी हैं, *क्योंकि गांव का बचपन गांव में नहीं रहता*।

हर घर में एक अधूरी कहानी है। हर आंगन में बच्चों की हंसी की जगह सन्नाटा है। हर मां की आंखें उस दिन भीग जाती हैं, जब वह अपने छोटे से बेटे या बेटी का बैग तैयार कर उसे गांव से दूर भेजती है। यह विदाई किसी उज्ज्वल भविष्य के सपनों की नहीं बल्कि सरकारी उदासीनता की मजबूरी है।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस जिले की पहचान देश को ऊर्जा देने से है उसी जिले के एक गांव के बच्चों को शिक्षा पाने के लिए अपने परिवार की ऊष्मा छोड़नी पड़ रही है।
देश आज चांद की सतह पर अपने कदमों के निशान छोड़ चुका है। डिजिटल इंडिया स्मार्ट गांव और नई शिक्षा नीति की बातें हो रही हैं। लेकिन मुड़धोवा में आज भी बारिश तय करती है कि बच्चा स्कूल जाएगा या नहीं।
यह सिर्फ पुलिया का सवाल नहीं है।
यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो विकास के आंकड़े तो गिनाती है लेकिन उन आंसुओं का हिसाब नहीं रखती जो हर बरसात में किसी मां की आंखों से बहते हैं। एक पुल बनने से केवल रास्ता नहीं खुलेगा। *उस दिन मां की चिंता कम होगी पिता का डर खत्म होगा और बच्चों का बचपन अपने घर लौट आएगा*।
सरकार के लिए यह शायद एक निर्माण कार्य होगा। एक फाइल होगी। एक प्रशासनिक प्रक्रिया होगी। लेकिन मुड़धोवा के लोगों के लिए यह उनके जीवन का सबसे बड़ा बदलाव होगा। किसी भी देश का भविष्य उसके बच्चों से तय होता है। और यदि वही बच्चे सुरक्षित शिक्षा के लिए अपने घर से दूर होने को मजबूर हों, तो यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है।
आज सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि पुल कब बनेगा?
सवाल यह है कि क्या हम इतने आधुनिक हो गए हैं कि बच्चों के हाथ में टैबलेट तो दे सकते हैं लेकिन उन्हें स्कूल तक पहुंचाने के लिए एक पुल नहीं बना सकते?जिस दिन मुड़धोवा के बच्चे बिना डर बिना बिछड़न और बिना किसी जोखिम के अपने गांव से स्कूल जा सकेंगे उसी दिन विकास के दावे सच माने जाएंगे।
क्योंकि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसके महानगरों से नहीं बल्कि उस आखिरी गांव के आखिरी बच्चे की मुस्कान से होती है।
Read more :- धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर कोरबा में जयसिंह अग्रवाल बोले “छात्रों ने मोदी सरकार का घमंड झुका दिया”









