संडे स्पेशल : मानसून में देवपहरी,परसखोला और फुटहामुड़ा के झरने बुलाते हैं,लेकिन अपना ध्यान रखें ?
नमस्ते कोरबा :- कोरबा को आमतौर पर देश की ऊर्जा राजधानी के रूप में जाना जाता है, लेकिन इस औद्योगिक पहचान के बीच यहां प्रकृति ने भी अपनी अनुपम छटा बिखेरी है। घने जंगल ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं और कल-कल बहते जलप्रपात इस जिले को प्राकृतिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं। देवपहरी, परसखोला और फुटहामुड़ा जैसे जलप्रपात आज न केवल कोरबा बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के लोगों के आकर्षण का केंद्र हैं।
मानसून शुरू होते ही यहां पर्यटकों का सैलाब उमड़ पड़ता है। लोग परिवार और दोस्तों के साथ प्रकृति का आनंद लेने पहुंचते हैं, लेकिन हर साल यही मौसम एक सवाल भी छोड़ जाता हैं,क्या हमारी पर्यटन स्थलों की खूबसूरती, सुरक्षा के बिना अधूरी नहीं है?
देवपहरी का जलप्रपात प्रकृति का अद्भुत उपहार
देवपहरी का जलप्रपात प्रकृति का अद्भुत उपहार है। बारिश के दिनों में चोरनई नदी का उफान पहाड़ियों से गिरता सफेद झरना और हरियाली से घिरी वादियां किसी भी पर्यटक को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। लेकिन यही सुंदरता कुछ कदम आगे बढ़ते ही खतरनाक रूप ले लेती है। चिकनी चट्टानें तेज बहाव और अचानक बढ़ता जलस्तर पल भर में किसी की जिंदगी छीन सकता है। यही स्थिति परसखोला और फुटहामुड़ा की भी है, जहां रोमांच की तलाश में लोग अक्सर खतरे की सीमा लांघ जाते हैं।
सुरक्षा व्यवस्था आज भी प्रतीकात्मक ही दिखाई देती है
दुर्भाग्य की बात यह है कि इन स्थानों पर हादसे कोई नई बात नहीं हैं। लगभग हर मानसून किसी न किसी जलप्रपात से डूबने, फिसलने या पानी के बीच फंस जाने की खबर सामने आती है। कई परिवार अपने अपनों को खो चुके हैं। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था आज भी प्रतीकात्मक ही दिखाई देती है।
कहीं चेतावनी बोर्ड नहीं, कहीं मजबूत बैरिकेडिंग नहीं, कहीं प्रशिक्षित लाइफगार्ड नहीं और कहीं आपातकालीन बचाव की कोई व्यवस्था नहीं। सवाल यह है कि क्या हर हादसे के बाद केवल अफसोस जताना ही हमारी व्यवस्था की जिम्मेदारी है?
पर्यटन केवल प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं चलता बल्कि सुरक्षा और सुविधाओं से भी चलता है
पर्यटन केवल प्राकृतिक सौंदर्य से नहीं चलता बल्कि सुरक्षा और सुविधाओं से भी चलता है। जिस स्थान पर हजारों लोग पहुंचते हों, वहां प्रशासन की जिम्मेदारी केवल सड़क बनाने तक सीमित नहीं हो सकती।
वहां जोखिम वाले क्षेत्रों को चिन्हित करना, सुरक्षा घेरा बनाना प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम तैनात करना, प्राथमिक उपचार की व्यवस्था करना और मानसून के दौरान नियमित निगरानी रखना उतना ही जरूरी है, जितना उस स्थल का प्रचार-प्रसार।
पर्यटकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
हालांकि पूरी जिम्मेदारी प्रशासन पर डाल देना भी उचित नहीं होगा। पर्यटकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सोशल मीडिया के दौर में खतरनाक चट्टानों पर खड़े होकर सेल्फी लेना, तेज बहाव वाले पानी में उतरना या चेतावनियों को नजरअंदाज करना रोमांच नहीं, लापरवाही है। कुछ मिनटों की तस्वीर या वीडियो के लिए अपनी और अपने परिवार की जिंदगी दांव पर लगाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
‘सुरक्षित पर्यटन संस्कृति’
आज जरूरत केवल सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाने की नहीं, बल्कि ‘सुरक्षित पर्यटन संस्कृति’ विकसित करने की है। जिस तरह राष्ट्रीय उद्यानों और बड़े पर्यटन स्थलों पर नियमों का पालन कराया जाता है, उसी तरह कोरबा के जलप्रपातों पर भी वैज्ञानिक और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था लागू करनी होगी। स्थानीय ग्रामीणों, वन विभाग, पुलिस, जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग के बीच समन्वय बनाकर इन स्थलों को सुरक्षित बनाया जा सकता है।
कोरबा के ये जलप्रपात जिले की पहचान हैं
कोरबा के ये जलप्रपात जिले की पहचान हैं। ये केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि हमारी प्राकृतिक धरोहर हैं। यदि इनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की गई तो हर मानसून इनके साथ किसी नए हादसे की खबर भी जुड़ती रहेगी। अब समय आ गया है कि प्रशासन हादसे होने के बाद कार्रवाई करने की बजाय हादसों को रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाए।
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