Sunday special : गुरु ने मांगी गुरुदक्षिणा… न फूल चाहिए, न उपहार… प्राचार्या बोलीं मेहनत करो, मैरिट में आओ,नकल से दूर रहो
नमस्ते कोरबा :- कभी गुरुकुल हुआ करते थे। गुरु के सान्निध्य में शिष्य वर्षों तक शिक्षा ग्रहण करता था और विदा होने से पहले गुरु से आशीर्वाद लेकर गुरुदक्षिणा देता था। समय बदला गुरुकुल बदले, शिक्षा के तरीके बदले और गुरुदक्षिणा का अर्थ भी बदल गया। लेकिन गुरु की अपेक्षा आज भी वही है,शिष्य जीवन में कुछ अच्छा करे।
शिक्षक दिवस के अवसर पर कोरबा के बलगी क्षेत्र के शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल में कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला जिसने इस पुरानी परंपरा को एक नए अर्थ के साथ सामने ला दिया। बच्चों ने अपने गुरुजनों का सम्मान किया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को याद किया गया। कार्यक्रम हुए खुशियां बांटी गईं। लेकिन इस पूरे आयोजन में सबसे ज्यादा दिल छूने वाली बात रही स्कूल की प्राचार्या स्नेह शर्मा की गुरुदक्षिणा।
उन्होंने बच्चों से कोई उपहार नहीं मांगा। उन्होंने फूल नहीं मांगे। उन्होंने यह भी नहीं कहा कि उनके लिए कुछ खरीदकर लाओ। उन्होंने सिर्फ कहा “मेहनत करो, मैरिट में स्थान लाओ और परीक्षा में नकल मत करो।” शायद आज के दौर में इससे बड़ी गुरुदक्षिणा कोई हो भी नहीं सकती।

आज का बच्चा नंबरों की दौड़ में है। माता-पिता की उम्मीदें हैं, प्रतियोगिता का दबाव है और हर कोई दूसरे से आगे निकलना चाहता है। इस दौड़ में कई बार यह भूल जाता है कि मंजिल तक पहुंचने से ज्यादा जरूरी है कि रास्ता सही हो। एक शिक्षक जब बच्चे से नकल न करने का संकल्प करवाता है तो वह सिर्फ परीक्षा की ईमानदारी की बात नहीं कर रहा होता। वह उसके चरित्र की नींव मजबूत कर रहा होता है।
क्योंकि नकल से अंक मिल सकते हैं योग्यता नहीं,नकल से प्रमाणपत्र मिल सकता है आत्मविश्वास नहीं। नकल से परीक्षा पास हो सकती है जिंदगी नहीं।यही वह बात है जिसे आज का शिक्षक समझ रहा है और बच्चों को समझाने की कोशिश कर रहा है।
शिक्षक अब केवल किताब का अध्याय पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह बच्चे के भीतर छिपे डर को पहचानता है उसकी कमजोरियों को समझता है और उसे यह भरोसा देता है कि असफल होना अंत नहीं है। मेहनत करते रहना ही असली जीत है। शायद इसलिए बलगी स्कूल में मांगी गई यह गुरुदक्षिणा महज एक संकल्प नहीं बल्कि शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाती है।
एक गुरु की सबसे बड़ी खुशी तब नहीं होती जब विद्यार्थी शिक्षक दिवस पर उसके पैर छूता है। गुरु की असली खुशी तब होती है, जब वही विद्यार्थी वर्षों बाद अपने पैरों पर खड़ा होकर कहता है “आपने जो सिखाया था, मैंने उसे जिंदगी में उतार लिया।”
फूल कुछ घंटों में मुरझा जाते हैं। उपहार कुछ दिनों में पुराने हो जाते हैं। लेकिन गुरु की दी हुई सीख अगर बच्चे के जीवन का हिस्सा बन जाए, तो वह उम्रभर साथ चलती है। इसलिए शायद शिक्षक दिवस का सबसे खूबसूरत संदेश यही है गुरु को सम्मान सिर्फ एक दिन मत दीजिए। उनकी सीख को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाइए।
और बच्चों के लिए भी एक बात याद रखने लायक है,आपकी सफलता में आपके माता-पिता का सपना और आपके गुरु की मेहनत दोनों शामिल होते हैं।इसलिए जब अगली बार परीक्षा की कॉपी सामने हो और आसान रास्ता आपको पुकारे, तो अपने गुरु की उस गुरुदक्षिणा को याद कीजिए“नकल नहीं करनी है मेहनत करनी है।” क्योंकि शायद किसी गुरु के लिए इससे खूबसूरत उपहार कुछ नहीं कि उसका शिष्य ईमानदारी से आगे बढ़े और एक दिन दुनिया उसे उसके नाम से नहीं उसकी सफलता से पहचाने।
यही गुरुदक्षिणा है। यही शिक्षक दिवस का असली अर्थ है।और यही शिक्षा की सबसे बड़ी जीत भी।
Read more :- श्री श्याम मंदिर कोरबा में कृष्ण कथा एवं जन्मोत्सव का भक्तिमय आयोजन









