चमकती सजावट, दम तोड़ती व्यवस्था!विकास की चमक के पीछे छिपी कोरबा शहर कर की बदहाली!

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चमकती सजावट, दम तोड़ती व्यवस्था!विकास की चमक के पीछे छिपी कोरबा शहर कर की बदहाली!

बाजार अव्यवस्थित, सड़कें अतिक्रमण की गिरफ्त में, सफाई और पार्किंग बेपटरी; समस्याएं जस की तस, फिर भी सौंदर्यीकरण पर लाखों खर्च। आखिर किस काम का यह विकास?

नमस्ते कोरबा : नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की शहर सुधारने की कवायद कई जगह दिखावे तक सिमटती नजर आती है। बाजार अव्यवस्थित हैं, सड़कें अतिक्रमण की चपेट में हैं, पार्किंग बेपटरी है और गंदगी का स्थायी समाधान नदारद। इसके बावजूद सौंदर्यीकरण और आधुनिक बाजार के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। नतीजा वही चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात। कुछ दिन की सक्रियता, थोड़ी चमक-दमक और फिर व्यवस्था पुराने ढर्रे पर। सरकारी धन, समय और ऊर्जा खर्च होने के बाद भी हालात जस के तस हैं।

आखिर विकास का पैमाना क्या है चमकती टाइलें, पेवर ब्लॉक और रंगीन लाइटें या नागरिकों को मिलने वाली वास्तविक सुविधा? यदि सड़क पर अतिक्रमण बरकरार है, नालियां कचरे से जाम हैं और बाजार में खरीदारों को चलने की जगह नहीं, तो साज-सज्जा किस काम की? समस्या की जड़ जस की तस रखकर ऊपर से चमक बिखेरने से बदहाली नहीं मिटती, सिर्फ खर्च बढ़ता है।

बुधवारी बाजार: भीतर बदहाली, बाहर सजावट

कोरबा का बुधवारी बाजार इस विसंगति की बानगी है। गंदगी, आंतरिक अतिक्रमण, बदहाल मार्ग, दुकानों के सामने पसरे तखत और खरीदारों की आवाजाही में बाधा—समस्याएं पुरानी हैं, लेकिन बाजार के बाहरी हिस्से को चमकाने में लाखों रुपये खर्च कर दिए गए। निःशुल्क आवंटित पसरों के उपयोग, कथित खरीद-फरोख्त, किरायेदारी और बेजा कब्जों पर भी सवाल हैं। इनकी जांच और वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के बजाय बाहरी सजावट को प्राथमिकता देना किस दूरदर्शिता का परिचायक है?

विडंबना यह है कि बाजार को आधुनिक बनाने के लिए लगाए गए सजावटी ढांचों का इस्तेमाल ही यदि तिरपाल बांधने और दुकानों को धूप-बारिश से बचाने तक सिमट जाए, तो सौंदर्यीकरण का मूल उद्देश्य कहां बचता है? नजारा अच्छा दिखना और व्यवस्था अच्छी होना दो अलग बातें हैं। पहली नजर को भा सकती है, दूसरी के लिए अनुशासन और जवाबदेही चाहिए।

सड़क जनता की या दुकानों का विस्तार?

सीतामणी से कोसाबाड़ी तक मुख्य सड़क पर दुकानें, सड़क तक फैला सामान, मोड़ों पर खड़े ठेले और बेतरतीब वाहन आवाजाही को बाधित करते हैं। सड़क किनारे कचरे और निर्माण सामग्री के ढेर इस संकट को और बढ़ाते हैं। आंतरिक व्यावसायिक तथा आवासीय क्षेत्रों में भी नालियों तक निर्माण और उनके ऊपर सीढ़ियां व प्लेटफॉर्म बनाने की प्रवृत्ति नियमों की निगरानी पर सवाल खड़े करती है।

जब भवन निर्माण की अनुमति की शर्तों के उल्लंघन की शिकायतें हों, तब निगरानी तंत्र आखिर कर क्या रहा है? यातायात अमला अकेले कितनी व्यवस्था संभाले, जब उसे अतिक्रमण हटाने और नियम लागू कराने में पर्याप्त प्रशासनिक सहयोग ही न मिले? नियम बनाना आसान है, उन्हें लागू करना असली कसौटी है।

पार्किंग के लिए निर्धारित स्थानों का उपयोग सुनिश्चित नहीं होगा, तो सड़कें ही पार्किंग स्थल बनेंगी। दुकानें सीमा से बाहर फैलेंगी, तो सड़क सिकुड़ेगी। मोड़ों पर वाहन खड़े होंगे, तो दुर्घटना का खतरा बढ़ेगा। यह कोई जटिल गणित नहीं, मगर प्रशासनिक अमले को इसी सीधे सवाल का जवाब देना है।

सफाई पर खर्च या गंदगी को सजाने की तैयारी?

बुधवारी बाजार हो, इतवारी बाजार या मुड़ापार का साप्ताहिक बाजार—कचरे के उचित निपटान और नालियों की सफाई का सवाल हर जगह अहम है। दुकानदारों द्वारा अपशिष्ट इधर-उधर छोड़ना और नालियों में कागज, फोम तथा अन्य सामग्री डालना जल निकासी की समस्या को बढ़ाता है। ऐसे में केवल पेवर ब्लॉक लगाकर या आसपास सजावट कराकर स्वच्छता की उम्मीद करना बेमानी है।

कचरा फेंकने की आदत नहीं बदली, निगरानी नहीं बढ़ी और कार्रवाई नहीं हुई, तो गंदगी टाइलों के बीच से भी रास्ता खोज लेगी। गैर-जिम्मेदार नागरिकों को अनुशासन सिखाना प्रशासन का दायित्व है, जबकि नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सार्वजनिक स्थानों को कूड़ाघर न बनाएं। सुविधा देने का अर्थ मनमानी की छूट देना नहीं होता।

बजट खर्च करने की हड़बड़ी, परिणाम की जवाबदेही कहां?

किसी मद में पैसा उपलब्ध है, तो उसे खर्च करने के लिए पेवर ब्लॉक लगवा दो, लाइटें लगवा दो या सजावट करा दो—क्या विकास की अवधारणा इतनी ही रह गई है? हर निर्माण से पहले यह देखना जरूरी है कि उसकी आवश्यकता क्या है, उससे कौन-सी समस्या सुलझेगी और उसके रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी होगी।

सार्वजनिक धन के खर्च में पारदर्शिता और काम की गुणवत्ता पर निगरानी अनिवार्य है। किसी परियोजना में कमीशनखोरी या अनियमितता के आरोप प्रमाण मांगते हैं, लेकिन खर्च और परिणाम के बीच असंगति हो तो जवाबदेही का सवाल उठना स्वाभाविक है। ठेकेदार का काम पूरा होना विकास नहीं; नागरिक की परेशानी दूर होना विकास है।

राजनीतिक दबाव और प्रभावशाली लोगों के प्रति नरमी की चर्चाएं भी तभी खत्म होंगी, जब कार्रवाई निष्पक्ष और नियमित होगी। अतिक्रमण हटाने का अभियान किसी खास दिन का आयोजन नहीं, सतत प्रक्रिया होनी चाहिए। अन्यथा कार्रवाई के बाद फिर वही कब्जे, वही अव्यवस्था और वही सरकारी कवायद सामने आती रहेगी।

शहर को चमकाइए नहीं, पहले संभालिए

दुकानदारों की रोजी-रोटी जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक सड़क पर स्थायी कब्जे का अधिकार किसी को नहीं। समाधान टकराव में नहीं, स्पष्ट दुकान सीमाओं, व्यवस्थित वेंडिंग जोन, पार्किंग, कचरा संग्रह और समान रूप से लागू नियमों में है। नगर निगम, जिला प्रशासन और यातायात पुलिस को साझा रणनीति बनाकर जवाबदेही तय करनी होगी।

बुधवारी बाजार को मॉडल बनाने की योजना हो या शहर के दूसरे हिस्सों का सौंदर्यीकरण, सफलता का प्रमाण खर्च की राशि और सजावट की तस्वीरें नहीं, बल्कि बदले हुए हालात होने चाहिए। बाजार साफ हुआ या नहीं, सड़क खुली या नहीं, जाम घटा या नहीं और अतिक्रमण दोबारा हुआ या नहीं—इन सवालों पर योजनाओं की समीक्षा होनी चाहिए।

कोरबा को दिखावटी विकास नहीं, टिकाऊ व्यवस्था चाहिए। बाहर चमकते पेवर ब्लॉक और भीतर पसरी बदहाली के बीच प्रशासन को यह समझना होगा कि शहर की सूरत केवल सजावट से नहीं, अनुशासन और जवाबदेही से बदलती है।

सवाल सीधा है—जब सड़क पर कब्जा बरकरार है, बाजार बदहाल है और सफाई व्यवस्था बेअसर है, तो आखिर यह सौंदर्यीकरण किसके लिए और किस उद्देश्य से? सरकारी धन खर्च करने से पहले योजनाओं की जरूरत, उपयोगिता और परिणामों पर ध्यान देना ही वास्तविक विकास की पहली शर्त है।

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