ऐसे पढ़ेगा इंडिया तो कैसे बढ़ेगा इंडिया,कोरबा जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्र में जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते बच्चे, देखिए यह खास रिपोर्ट

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ऐसे पढ़ेगा इंडिया तो कैसे बढ़ेगा इंडिया,कोरबा जिले के सुदूर वनांचल क्षेत्र में जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते बच्चे, देखिए यह खास रिपोर्ट

नमस्ते कोरबा : ‘‘शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो पीएगा वो दहाड़ेगा‘‘ भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर के इस संदेश में शिक्षा का वह महत्व छिपा है जो किसी गरीब, वंचित समाज को प्रगति के रास्ते पर ले जाकर अलग पहचान दिलाने का काम करता है। जो जितना अधिक शिक्षित होगा, वह उतना ही प्रभावशाली पहचान बना पायेगा।

लेकिन कोरबा जिला के सुदूर वनांचल क्षेत्र में बच्चों को शिक्षा के लिए काफी जदोजहद करनी पड़ती है,सरकारें बदलती रहीं, अधिकारी आते और जाते रहे लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की तस्वीर और ग्रामीणों तथा उनके बच्चों की तकदीर बदलने के मामले में आज भी बहुत कुछ काम करना बाकी है।

यह तस्वीर न सिर्फ डराती है बल्कि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के प्रति उनके जुझारूपन को भी दर्शाती भी है कि वह किस तरह से पढ़ाई करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर आते-जाते हैं।

जरा सा पैर फिसला या हाथ छूटा तो सीधे नदी में बह जाना है। प्रशासनिक अधिकारियों की पहुंच आसान क्षेत्र तक रहती है लेकिन वह अंदरूनी इलाकों में बहुत कम ही जाते हैं।

यही वजह है कि आज भी ग्रामीण बीहड़ क्षेत्र कई मामलों में आजादी के वर्षों बाद भी विकास के अमृत से अछूते हैं,कोरबा जिले में पोड़ी उपरोड़ा ब्लाक के ग्राम सेंदुरगढ़ के स्कूली बच्चों को स्कुल जाने के लिए रास्ता ही नहीं है। बच्चे जान जोखिम में डालकर नाले में लकड़ी का सीढ़ी जैसा पटरा लगाकर प्रतिदिन रास्ता पार करते हैं।

उस वक्त का मंजर देखने में और भयावह और सांस रोक देने वाला होता है ज़ब नाले में पानी उफ़ान पर होता है लेकिन शिक्षा विभाग को इसकी भनक नहीं। अधिकारी के संज्ञान में आने के बाद जल्द ही उचित व्यवस्था करने की बात कही गई है।

सुदूरअंचल सेंदुरगढ़ ग्राम पंचायत के बच्चे सासिन में स्थित मिडिल स्कुल में पढ़ाई करने जाते हैं। गांव से स्कूल की दुरी लगभग 5 किलोमीटर बताई जाती है। शिक्षक मैकुल सिंह ने बताया कि स्कुल जाने के लिए पुल तो है लेकिन बच्चों को घना जंगल पार करना पड़ता है जहाँ भालू जैसे जंगली जानवरों का भी खतरा बना रहता है। इस वजह से बच्चे शार्ट कट अपनाते हैं जिसकी दुरी महज 300 मीटर ही है।

जहाँ से बच्चे नाला पार करते हैं, उक्त स्थान पर प्रतिदिन ग्राम की मितानिन लकड़ी का पटरा लगाकर बच्चों को पार कराती है। उस वक्त का मंजर ऐसा रहता है जिसकी कल्पना से दिल सिहर उठता है। उक्त मार्ग में पुल निर्माण कर उचित व्यवस्था करने करने की जरूरत है ताकि 5 किलोमीटर घूमते हुए घने जंगल का रास्ता तय न करना पड़े।

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