नमस्ते कोरबा :-: कोरोना महामारी के साए में छत्तीसगढ़ का लोक पर्व छेरछेरा कोरबा में भी मनाया जा रहा है सुबह से ही बच्चों का झुंड छेरछेरा मांगने निकल पड़ा है,छेरछेरा का महत्व छत्तीसगढ़ में दिवाली और होली के त्योहार जैसा है. कोई भी परिवार अपने बच्चों को दूसरों से कुछ भी मांगते देखना नहीं चाहते, छत्तीसगढ़ में साल में एक ऐसा दिन आता है, जब परिवार के लोग खुद बच्चों को तैयार करते हैं. बच्चे घर-घर जाकर नजराना मांगते हैं. वहीं लोग भी बच्चों को उत्साह पूर्वक दान देते हैं.
नगर सहित ग्रामीण अंचलों में सोमवार को छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार छेरछेरा पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा है। पर्व को लेकर ग्रामीण खास कर बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला। लोग झोला एवं बोरी लेकर छेर छेरा मांगने के लिए अपने-अपने घरो से निकले। नगर के साथ गांव के दरवाजे पर बैठे महिलाओं- पुरुषों ने छेरछेरा के रुप में धान के साथ यथासंभव रुपए तथा घरों में बनाए पकवान भी दिया। कई घरों के लोगों ने बच्चों को चाकलेट दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में इस त्यौहार को बड़े धूमधाम से उत्साह पूर्वक मनाते हैं। इस दिन बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग घर-घर जाकर छेरछेरा के रुप में धान मांगते हैं। लोग छेरछेरा के रुप में धान के साथ यथासंभव रुपए तथा चॉकलेट, घरों में बनाए पकवान भी देते हैं। यह पर्व फसल मिसाई के बाद खुशी मनाने से संबंधित है। पर्व में अमीरी-गरीबी के भेदभाव से दूर एक-दूसरे के घर जाकर छेरछेरा मांगते हुए कहते हैं छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेर हेरा। मान्यता है कि धान के कुछ हिस्से को दान करने से अगले वर्ष अच्छी फसल होती है। इसलिए इस दिन किसान अपने दरवाजे पर आए किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं करते।









