Sunday special : “कोरबा के जंगलों में डालियों पर टंगा अमृत: तेंदू में छिपी सेहत, स्वाद और आजीविका की कहानी”
नमस्ते कोरबा :- घने जंगल, ऊंची पहाड़ियां और हरियाली से लिपटी वादियां… कोरबा का वनांचल इन दिनों प्रकृति की एक अनमोल तस्वीर पेश कर रहा है। फुटका पहाड़ की ढलानों पर तेंदू के पेड़ों में लदे गुच्छे न केवल आंखों को सुकून देते हैं, बल्कि अपने भीतर सेहत और समृद्धि का संदेश भी समेटे हुए हैं।
अंगूर जैसे दिखने वाले तेंदू फल अब पकने की कगार पर हैं। बाजारों में दिखने वाला यह साधारण-सा फल दरअसल जंगलों में एक अद्भुत रूप में नजर आता है पेड़ों पर लटकते इसके घने गुच्छे किसी प्राकृतिक गहने से कम नहीं लगते। यही दृश्य शहरी जीवन में दुर्लभ है, जहां लोग केवल इसका स्वाद जानते हैं, लेकिन इसकी वास्तविक सुंदरता से अनजान रहते हैं।
बालकों से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित पुटका पहाड़ में तेंदू के पेड़ों की भरमार है। यह क्षेत्र न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र है, बल्कि जैव विविधता का जीवंत उदाहरण भी है। यहां तेंदू के साथ कई अन्य वनोपज भी मौजूद हैं, जो इस इलाके को पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं।
तेंदू का महत्व केवल इसके स्वाद तक सीमित नहीं है। पारंपरिक ज्ञान और आयुर्वेद में इसकी खास पहचान है। जानकारों के अनुसार, इसकी पत्तियां और छाल पेट से जुड़ी बीमारियों में लाभकारी मानी जाती हैं, वहीं इसका फल शरीर को ऊर्जा और पोषण देता है। यही कारण है कि यह फल जंगल की ‘प्राकृतिक औषधि’ के रूप में भी जाना जाता है।
इससे भी बढ़कर तेंदू स्थानीय ग्रामीणों और वनवासियों के लिए आजीविका का प्रमुख साधन है। इसके पत्तों से बनने वाली बीड़ी उद्योग से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। हर साल तेंदूपत्ता संग्रहण के मौसम में गांवों में एक अलग ही हलचल देखने को मिलती है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धड़कन बन जाती है।










