Sunday, February 22, 2026

Sunday special :“क्या आपने भी किसी को बिना बताए खो दिया?” 25 साल की खामोशी और एक कॉल जिसने सब बदल दिया

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Sunday special :“क्या आपने भी किसी को बिना बताए खो दिया?” 25 साल की खामोशी और एक कॉल जिसने सब बदल दिया

नमस्ते कोरबा :- बारहवीं कक्षा का वह आख़िरी साल… जब आंखों में भविष्य के सपने थे और दिल में जुदाई की आहट। रिज़ल्ट आया मार्कशीट हाथ में आई और एक साथ हंसने-बैठने वाले चेहरे अचानक अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए। किसी ने इंजीनियरिंग का रास्ता चुना, कोई नौकरी की दौड़ में उतर गया, तो कोई घर की जिम्मेदारियों में उलझ गया।

लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो जीवन की भीड़ में भी पीछे नहीं छूटते।

स्कूल के दिनों में जिसे “मोटी” और “चश्मिश” कहकर चिढ़ाया जाता था, वही एक लड़की किसी के दिल के कोने में चुपचाप अपनी जगह बना चुकी थी। तब शायद यह एहसास नहीं था कि वह सिर्फ एक सहपाठी नहीं बल्कि यादों की सबसे स्थायी तस्वीर बन जाएगी।

तलाश… जो थमी नहीं

समय का पहिया तेज़ी से घूमता रहा दुनिया बदल गई। सोशल मीडिया ने रिश्तों को फिर से जोड़ने का दावा किया। फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम पर पुराने दोस्तों की तलाश शुरू हुई। बैच के ग्रुप बने, ठहाके लौटे, तस्वीरें साझा हुईं।

लेकिन एक नाम… हर बार गायब रहा।

कई बार उसका नाम सर्च किया गया। कई बार दोस्तों से पूछा गया। जवाब हर बार एक ही मिला “यार, पता नहीं…”

फिर एक दिन पुराने स्कूल जाने का अवसर मिला। वही मैदान, वही बरामदा, वही कक्षाएं जहां कभी घंटी बजने का इंतज़ार रहता था। धूल जमी़ रजिस्टरों के बीच से एक पुराना फोन नंबर मिला। उम्मीद और डर के बीच नंबर मिलाया गया। उधर से जवाब आया “वो अब इस शहर में नहीं रहती…”

बस इतना सुनकर तलाश और गहरी हो गई।

दो हजार बैच के दोस्तों से फिर संपर्क हुआ। किसी ने कहा, “सुना है दूसरे शहर में है…” किसी ने किसी रिश्तेदार का जिक्र किया। दिनों की भागदौड़, अनगिनत कॉल, निराशा और फिर उम्मीद…और आखिरकार एक नंबर मिल गया।

फोन हाथ में था। उंगलियां कांप रही थीं। पच्चीस साल की चुप्पी एक रिंग में सिमट गई थी।

“हैलो…” एक शब्द। लेकिन उस एक शब्द ने समय को पीछे मोड़ दिया। जैसे 17 साल की उम्र फिर सामने खड़ी हो। नाम लिया गया। कुछ पल की चुप्पी… फिर उधर से भर्राई आवाज़ “तुम… सच में तुम?”पहचान अब भी ज़िंदा थी।

मुलाक़ात… जो वक्त से बड़ी थी

अगली सुबह की फ्लाइट से मुलाकात तय हुई। एयरपोर्ट पर वह खड़ी थी अब न “मोटी”, न “चश्मिश” बल्कि आत्मविश्वास से भरी, गरिमामयी और जीवन के अनुभवों से परिपक्व एक महिला। समय ने चेहरे बदले, लेकिन आंखों की चमक नहीं बदली। दोनों ने एक-दूसरे को देखा… और पच्चीस साल की दूरी एक पल में पिघल गई।

कॉफी के कप के बीच हंसी भी थी, रुलाई भी थी और वे शब्द भी थे, जो कभी कहे नहीं गए। क्योंकि कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते। वे बस समय की तहों में दब जाते हैं।

यह सिर्फ एक कहानी नहीं…

यह कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है। यह उन तमाम लोगों की कहानी है, जिनकी जिंदगी में कोई ऐसा नाम आज भी सांस ले रहा है जिसे कभी बताया नहीं गया कि वह कितना खास था।

जिनसे बिछड़ते वक्त लगा था“फिर मिलेंगे…” लेकिन वह “फिर” कभी आया ही नहीं। जिंदगी हमें सफलता देती है, पहचान देती है, स्थायित्व देती है। लेकिन अधूरी कहानियां… वे दिल के किसी कोने में हमेशा धड़कती रहती हैं। कभी-कभी, एक फोन कॉल पच्चीस साल की खामोशी तोड़ देता है। और एक ‘हैलो’ हमें फिर से जीना सिखा देता है।

इस संडे शायद समय आ गया है,उस एक नाम को फिर से याद करने का।

 

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