नमस्ते कोरबा – कोरबा निवासी संतोष गुप्ता के आपरेशन के दौरान किडनी निकाल लिए जाने के मामले में फर्जी डाक्टर एसएन यादव के खिलाफ जांच रिपोर्ट को 10 वर्षों तक दबाए रखा जाना गंभीर चिंता पैदा कर रहा है। वर्ष 2012 की घटना में वर्ष 2013 में ही स्पष्ट हो गया था कि बिहार का मूल निवासी एसएन यादव नकली प्रमाणपत्रों के आधार पर खुद को असम के गुवाहटी विश्वविद्यालय से एमबीबीएस और तमिलनाडु के चेन्नई विश्वविद्यालय से एमएस (मास्टर आफ सर्जरी) बता रहा था। यह भी स्पष्ट हो गया था कि छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में उसका पंजीयन नहीं है, इसलिए अवैध रूप से आपरेशन कर रहा था।
उसके बाद भी वह फरवरी, 2022 तक आपरेशन करता रहा। रविवार को अपराध दर्ज होने के बाद से वह फरार
है। पड़ताल में स्पष्ट हो चुका है कि तत्कालीन जिला मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमएचओ) डा. पीआर कुंभकार ने जांच रिपोर्ट दबा दी। उनके बाद के सीएमएचओ भी वही काम करते रहे। फर्जीवाड़ा सामने लाने के असली नायक किडनी निकाले जाने के बाद अस्वस्थ्य चल रहे संतोष गुप्ता हैं, जो यादव को सजा दिलाने के लिए प्रशासनिक कार्यालय से लेकर उपभोक्ता फोरम और न्यायालय तक के चक्कर काटते रहे।
न्याय दिलाने के लिए जवाबदेह सभी संस्थाओं को अपनी कार्यप्रणाली पर मंथन करना चाहिए कि पीड़ित को चक्कर क्यों काटने पड़े? कब तक न्याय सुनिश्चित हो पाएगा? पीड़ित ने बीते वर्ष जुलाई में कलेक्टर रानू साहू को शिकायत की थी कि जांच रिपोर्ट आने के बाद भी फर्जी चिकित्सक के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है। वर्तमान सीएमएचओ डा. बीबी बोर्डे से जांच रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद फर्जीवाड़ा सार्वजनिक हुआ और अब कलेक्टर के आदेश पर केस दर्ज हुआ है।
इस दौरान फर्जी डिग्रीधारी ने कितने मरीजों का आपरेशन किया और जीवन से खेला, यह स्पष्ट होना अभी बाकी है। पूरे प्रकरण में इतना तो स्पष्ट हो ही चुका है कि फर्जी डाक्टर दोषी है तो उसे बचाने वाले पूर्व सीएमएचओ डा. पीआर कुंभकार उससे बड़े दोषी हैं। फर्जीवाड़ा के खिलाफ कार्रवाई में भ्रष्टाचार आड़े आता रहा और पीड़ित एक किडनी के सहारे व्यवस्था से संघर्ष करता रहा। यह विचारणीय है कि डा. कुंभकार जैसे भ्रष्टाचार संरक्षकों पर क्या कार्रवाई की जानी चाहिए?
चिकित्सा के पवित्र पेशे को कलंकित करने वाले को किस तरह की सजा दी जाए? सरकारी तंत्र में बैठे फर्जी लोग ज्यादा चिंता पैदा कर रहे हैं। यादव के साथ-साथ कुंभकार के खिलाफ भी केस दर्ज कराने की पहल की जानी चाहिए थी। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव से उम्मीद की जाती है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए कार्रवाई सुनिश्चित कराएंगे। व्यवस्था के अंदर बैठकर गलत लोगों का संरक्षण करने वालों को किसी भी स्तर पर रियायत नहीं मिलनी चाहिए।









