मोबाइल आया, कंप्यूटर आया… नहीं बदली गुरुशरण की बही,हिंदी अंकों में आज भी दर्ज है चार दशक पुराना कारोबार, देखिए इस खास खबर में

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मोबाइल आया, कंप्यूटर आया… नहीं बदली गुरुशरण की बही,हिंदी अंकों में आज भी दर्ज है चार दशक पुराना कारोबार, देखिए इस खास खबर में

नमस्ते कोरबा :- आज दुकानों में कंप्यूटर हैं मोबाइल पर भुगतान है और हिसाब-किताब एक क्लिक में सामने आ जाता है। लेकिन बालको के आजादनगर की एक छोटी-सी दुकान में वक्त जैसे आज भी वहीं ठहरा हुआ है। यहां न तो पुरानी बही ने डिजिटल हिसाब के आगे घुटने टेके हैं और न ही स्याही से लिखे अक्षरों ने कंप्यूटर की स्क्रीन के सामने अपनी पहचान खोई है।

यह है चंद्रा जनरल स्टोर जहां सामान खरीदने वाले ग्राहक को भले ही आधुनिक बिल और रसीद मिलती हो, लेकिन दुकान के भीतर एक ऐसी दुनिया भी है, जो आज के दौर से बिल्कुल अलग है। इस दुनिया में हिसाब कंप्यूटर पर नहीं, पारंपरिक हिंदी अंकों और पुरानी हिंदी शब्दावली में बही-खाते के पन्नों पर लिखा जाता है।

इस परंपरा को चार दशक से संभालकर बैठे हैं व्यापारी **गुरुशरण चंद्रा**। 80 के दशक में शुरू हुई उनकी दुकान ने समय के साथ बहुत कुछ बदलते देखा लेकिन उनकी खाता-बही आज भी उसी अंदाज में चल रही है। स्याही से लिखी उनकी खास लिखावट में दर्ज हर रकम के पीछे सिर्फ लेन-देन नहीं बल्कि किसी ग्राहक से जुड़ी एक कहानी भी छिपी है।

सबसे दिल छू लेने वाला दृश्य तब बनता है जब आधुनिक शिक्षा हासिल कर इंजीनियर बना उनका बेटा कभी पिता की गद्दी पर बैठता है। कंप्यूटर और तकनीक की दुनिया में काम करने वाला बेटा कुछ पल के लिए उस पुरानी बही को खोलता है। पन्ने पलटता है और पिता की लिखावट में दर्ज हिसाब को पढ़ता है। मानो उन पन्नों के साथ वह अपने पिता के संघर्ष मेहनत और संस्कारों को भी पढ़ रहा हो।

कभी व्यापार का सबसे बड़ा आधार तकनीक नहीं **भरोसा और जुबान** हुआ करती थी। उधारी का हिसाब कागज पर जरूर लिखा जाता था, लेकिन असली भरोसा दुकानदार और ग्राहक के रिश्ते में होता था। सालों पुराने ग्राहक का नाम बही में दर्ज होना महज एक एंट्री नहीं बल्कि एक रिश्ते की निशानी माना जाता था।

आज डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन बिलिंग ने व्यापार की तस्वीर बदल दी है। हिसाब सेकंडों में हो जाता है, लेकिन इन पुरानी बहियों के पन्नों पर ठहरी स्याही हमें उस दौर में ले जाती है, जब एक दुकानदार की जुबान ही उसकी रसीद हुआ करती थी और ग्राहक का भरोसा ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी।

गुरुशरण चंद्रा की यह बही इसलिए खास नहीं कि इसमें पुराने अंकों में हिसाब लिखा है। इसकी असली कीमत इसलिए है क्योंकि इन पन्नों में पैसे से ज्यादा वक्त दर्ज है पिता की मेहनत, परिवार का संघर्ष, ग्राहकों के रिश्ते और बदलते दौर के बीच बची एक ऐसी परंपरा, जिसे अगली पीढ़ी आधुनिक होकर भी भूल नहीं पाई।

कंप्यूटर हिसाब बता सकता है, लेकिन क्या वह किसी रिश्ते की कहानी भी लिख सकता है? शायद यही सवाल इस पुरानी बही के हर पन्ने से आज भी पूछा जा सकता है।

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