ऊर्जाधानी कोरबा बना ‘मच्छरों की राजधानी’,जनता अपने दम पर लड़ रही मच्छरों से जंग
नमस्ते कोरबा : प्रदेश की ऊर्जाधानी कोरबा इन दिनों बिजली उत्पादन नहीं, बल्कि मच्छरों के बढ़ते आतंक को लेकर चर्चा में है। 67 वार्डों वाला यह औद्योगिक शहर धीरे-धीरे ‘मच्छरों की राजधानी’ बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि घर, अस्पताल, स्कूल, दफ्तर और बाजार हर जगह मच्छरों का कब्ज़ा है, जबकि नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई केवल कागज़ों तक सीमित नजर आ रही है।

फॉगिंग मशीनें जंग खा रही, महीनों से लार्वा कंट्रोल बंद 67 वार्डों में मच्छरों का आतंक
शहर में मच्छर नियंत्रण के नाम पर फॉगिंग लगभग बंद है।जो मशीनें हैं वे भी जंग खाती नजर आ रही हैं। लार्वा कंट्रोल अभियान ठप है, नालियों की नियमित सफाई नहीं हो रही और जगह-जगह जलभराव मच्छरों के लिए स्थायी ठिकाना बन चुका है।
जनता खुद कर रही खर्च
मच्छरों के आतंक से बचने के लिए अब लोग खुद अपनी जेब से कॉइल, स्प्रे, इलेक्ट्रिक मशीन और दवाइयों पर हजारों रुपये खर्च कर रहे हैं। निजी अस्पतालों और मेडिकल स्टोरों में मच्छर जनित बीमारियों से जुड़े मरीजों की संख्या बढ़ रही है। डेंगू, मलेरिया और वायरल का खतरा लगातार मंडरा रहा है, लेकिन जिम्मेदार विभागों की सक्रियता जमीनी स्तर पर नजर नहीं आ रही।
कागज़ों में नियंत्रण, जमीन पर संकट
नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की ओर से हर साल मच्छर नियंत्रण करने का दावा किया जाता है। लेकिन शहर के वार्डों में न फॉगिंग की दिख रही है, न लार्वा सर्वे। कई इलाकों में गंदगी और पानी जमा रहने से मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ी है। सवाल उठ रहा है कि बजट खर्च होने के बावजूद राहत क्यों नहीं मिल रही?
ऊर्जाधानी कोरबा प्रदेश को रोशनी देता है, लेकिन खुद बुनियादी स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए तरस रहा है। नियमित फॉगिंग, लार्वा कंट्रोल और सफाई अभियान तत्काल शुरू करने के साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग उठने लगी है।
अब बड़ा सवाल यही है
क्या प्रशासन मच्छरों की इस ‘अदृश्य सरकार’ को खत्म कर पाएगा, या ऊर्जाधानी कोरबा यूं ही मच्छरों की राजधानी बना रहेगा?







