देवपहरी : प्रकृति की गोद में पर्यटन, आस्था और जिम्मेदारी का अनूठा संगम,देखिए देवपहरी की खूबसूरती इस वीडियो में
नमस्ते कोरबा :- कोरबा जिले के लेमरू वनांचल क्षेत्र में स्थित देवपहरी जलप्रपात आज केवल एक दर्शनीय स्थल नहीं रहा, बल्कि यह प्रकृति प्रेमियों, पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए एक भावनात्मक अनुभव बन चुका है। शहर से लगभग 60–65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह जलप्रपात अपने वेगवान, दूध-सी उजली जलधारा, गूंजती आवाज और चारों ओर फैली विशाल, चमकती चट्टानों के कारण हर आगंतुक के मन में स्थायी छवि छोड़ देता है। यहां पहुंचने वाला व्यक्ति न केवल इस दृश्य को देखता है, बल्कि उसे महसूस करता है,यही कारण है कि देवपहरी एक बार देखने के बाद बार-बार बुलाता है।
देवपहरी की खासियत सिर्फ उसका जलप्रपात नहीं, बल्कि वहां तक पहुंचने का सफर भी है। घने जंगलों के बीच से गुजरते घुमावदार रास्ते, पहाड़ियों की श्रृंखलाएं, छोटे-छोटे नदी-नाले और वनांचल में बसे जनजातीय परिवारों का सरल जीवन पर्यटकों को प्रकृति और संस्कृति—दोनों से जोड़ता है। यह यात्रा रोमांच, कौतूहल और सीख से भरपूर होती है। विशेषकर ठंड के मौसम में देवपहरी कोरबा जिले का सबसे पसंदीदा पिकनिक और पर्यटन स्थल बन जाता है।
प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ देवपहरी आस्था और सामाजिक चेतना का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां स्थित गोमुखी सेवा धाम द्वारा संचालित एकलव्य उच्चतर माध्यमिक विद्यालय आदिवासी बच्चों की शिक्षा और उनके सर्वांगीण विकास में अहम भूमिका निभा रहा है। मां सिद्धिदात्री देवी का मंदिर वर्षों से क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। इसी परिसर में निर्मित हिंगलाजगढ़ ने देवपहरी को धार्मिक पहचान भी दिलाई है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित हिंगलाज देवी शक्तिपीठ की प्रतीकात्मक स्थापना, देश के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और मध्य भारत के शक्तिपीठों से लाई गई अखंड ज्योतियां और भारत माता की भावना से जुड़ा स्थापत्य देवपहरी को आस्था और राष्ट्रभाव का संगम बनाता है।
हिंगलाजगढ़ में अमर शहीदों और वीरों की तस्वीरें, अखंड भारत का नक्शा और जल से घिरा प्रवेश मार्ग श्रद्धालुओं को देवी आराधना के साथ देशभक्ति का संदेश भी देता है। यही कारण है कि यहां केवल पर्यटक ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी दर्शन और पूजन के लिए पहुंच रहे हैं। उनके लिए यह अनुभव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और गर्व से भर देने वाला होता है।
हालांकि, देवपहरी की बढ़ती लोकप्रियता के साथ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। कुछ पर्यटकों द्वारा फैलायी जा रही गंदगी, प्लास्टिक, बोतलें और खाद्य पैकेट इस प्राकृतिक धरोहर के सौंदर्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वहीं अति उत्साह में खतरनाक चट्टानों पर जाना, गहरे पानी में छलांग लगाना और जोखिम भरी सेल्फी लेना कई बार जानलेवा साबित हो सकता है। यह स्थान जितना सुंदर है, उतना ही संवेदनशील और जोखिमपूर्ण भी है विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए। बारिश के मौसम में यहां आना गंभीर खतरे को न्योता देने जैसा है।
देवपहरी आज कोरबा जिले की पहचान बन चुका है,एक ऐसा स्थल जहां प्रकृति शांति देती है, आस्था सुकून देती है और यात्रा जीवन को नई ऊर्जा से भर देती है। आवश्यकता है कि पर्यटन के साथ जिम्मेदारी की भावना भी विकसित हो। स्वच्छता, सुरक्षा और संयम के साथ यदि देवपहरी को देखा-संवारा गया, तो यह स्थान आने वाली पीढ़ियों के लिए भी इसी तरह आकर्षण, आस्था और आनंद का केंद्र बना रहेगा।
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