“गुड़ियों से खेलने की उम्र में मौत से संतुलन, रोटी के लिए रस्सी पर चलती बेटी”
नमस्ते कोरबा :- दो खंभों के बीच बंधी पतली रस्सी पर नंगे पांव संतुलन बनाती एक नन्ही बच्ची जिसकी उम्र स्कूल जाने और खिलौनों से खेलने की है,मगर वह अपने परिवार का पेट भरने के लिए जान जोखिम में डालकर करतब दिखाने को मजबूर है।
ढोल की धीमी थाप के बीच बच्ची जब रस्सी पर चढ़ती है, तो हर कदम के साथ नीचे खड़े माता-पिता की सांसें थम जाती हैं। बच्ची के हाथ में संतुलन का डंडा है, चेहरे पर बनावटी मुस्कान और आंखों में जिम्मेदारी का बोझ। कुछ मिनट के इस करतब के बदले उसे मिलते हैं कुछ सिक्के, जिनसे उसके घर का चूल्हा जलता है।
राहगीर रुकते हैं, करतब देखते हैं, मोबाइल से वीडियो बनाते हैं और तालियां बजाकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन शायद ही कोई समझ पाता है कि यह मनोरंजन नहीं, बल्कि मजबूरी का प्रदर्शन है। हर दिन यह बच्ची गिरने और घायल होने के खतरे के बीच संतुलन साधती है, क्योंकि उसके लिए सबसे बड़ा डर भूख का है।
सवाल यह उठता है कि “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” के नारों के बीच आखिर क्यों ये बेटियां मौत की रस्सी पर चलने को मजबूर हैं? क्यों उनके हाथों में किताबों की जगह संतुलन का डंडा है?
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