मिट्टी के दीयों की सादगी से मोबाइल की चकाचौंध तक… बदला त्योहार का स्वरूप, लेकिन कहीं पीछे छूट गया रिश्तों का अपनापन
नमस्ते कोरबा : दिवाली हर साल आती है। घर सजते हैं, बाजार रोशनी से नहाते हैं, मिठाइयों की खरीदारी होती है और आसमान आतिशबाजी से जगमगाता है। लेकिन हर दिवाली के साथ मन के किसी कोने में एक सवाल जरूर उठता है कि क्या आज भी हम वही दिवाली मना रहे हैं, जिसका इंतजार कभी बचपन में महीनों पहले से शुरू हो जाता था? वक्त बदला, जीवनशैली बदली और त्योहार मनाने का अंदाज भी बदल गया, लेकिन इस बदलाव में कहीं न कहीं वह सहज खुशी और पारिवारिक अपनापन पीछे छूट गया, जो दिवाली की असली पहचान हुआ करता था।
एक दौर था जब दिवाली की तैयारियां त्योहार से कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं। घर की सफाई और पुताई पूरे परिवार का सामूहिक आयोजन होती थी। मां के पीछे-पीछे सफाई में हाथ बंटाना, पिता के साथ बाजार जाकर मिट्टी के दीये खरीदना और घर लौटकर उन्हें सजाने की उत्सुकता ही त्योहार का पहला आनंद हुआ करती थी। तब घर की चमक सिर्फ दीवारों से नहीं बल्कि परिवार के एक साथ जुटने से बढ़ती थी।
आंगन में रखे मिट्टी के दीये, रूई की बातियां और तेल की सोंधी महक दिवाली की पहचान थे। रंगोली के रंगों में बच्चों की कल्पनाएं सजती थीं। रसोई में मां के हाथों से बनती गुजिया, लड्डू और शक्करपारे की खुशबू पड़ोस तक पहुंचती थी। मिठाइयों का आदान-प्रदान रिश्तों की मिठास बढ़ाता था। न महंगे उपहारों का दबाव था न दिखावे की प्रतिस्पर्धा। एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देना ही सबसे बड़ा उत्सव था।
बच्चों के लिए तो दिवाली साल का सबसे बड़ा इंतजार होती थी। नए कपड़ों की खुशी, फुलझड़ी और चकरी चलाने का उत्साह, भाई-बहनों के साथ पटाखों को लेकर होने वाली नोकझोंक और देर रात तक घर में गूंजती हंसी त्योहार को यादगार बना देती थी। उस समय खुशियों के साधन सीमित थे, लेकिन खुशियां बांटने वाले लोग और उनके बीच का अपनापन भरपूर था।
आज तस्वीर काफी बदल चुकी है। मिट्टी के दीयों की जगह रंगीन इलेक्ट्रॉनिक झालरों ने ले ली है। घर की बनी मिठाइयों की जगह बाजार के आकर्षक पैकेटों ने ले ली है। परिवार के बीच बैठकर बातचीत करने की जगह मोबाइल पर शुभकामनाएं भेजने का चलन बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर त्योहार की तस्वीरें और संदेश साझा करने की होड़ है। उत्सव की भव्यता बढ़ी है लेकिन क्या उसके पीछे छिपी आत्मीयता भी उतनी ही बढ़ी है? यह विचार करने का विषय है।
समस्या आधुनिकता नहीं बल्कि आधुनिकता की दौड़ में परंपराओं और रिश्तों को पीछे छोड़ देना है। त्योहारों का उद्देश्य केवल खरीदारी, सजावट और मनोरंजन नहीं होता। वे परिवार को जोड़ने, सामाजिक सद्भाव बढ़ाने और आपसी संबंधों को मजबूत करने का अवसर होते हैं। जब पड़ोसी एक-दूसरे के घर जाना बंद कर दें, बुजुर्ग अपनों के साथ वक्त बिताने को तरसें और बच्चों के लिए त्योहार का अर्थ केवल नए कपड़े और पटाखे रह जाए तब हमें अपने उत्सवों के बदलते स्वरूप पर जरूर विचार करना चाहिए।
यह भी सच है कि बीते समय को वापस नहीं लाया जा सकता। मां के हाथों की मिठाइयां, पिता के साथ बाजार जाने की खुशी और भाई-बहनों के साथ बिताए वे बेफिक्र दिन अब स्मृतियों का हिस्सा हैं। लेकिन उन परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना आज भी हमारे हाथ में है। बच्चों को मिट्टी के दीयों का महत्व बताना, घर में मिलकर पकवान बनाना, बुजुर्गों के साथ समय बिताना और जरूरतमंदों के जीवन में खुशियां बांटना ही त्योहार की वास्तविक भावना को जीवित रख सकता है।
दिवाली का संदेश अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का है। यह प्रकाश केवल घरों और सड़कों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि हमारे व्यवहार, विचार और रिश्तों में भी दिखाई देना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि हम उत्सव को दिखावे की प्रतिस्पर्धा बनाने के बजाय उसे संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से जोड़ें। क्योंकि दिवाली की असली रोशनी महंगी झालरों में नहीं, अपनों की मुस्कान में होती है। मिट्टी का एक छोटा-सा दीया भी उस समय हजारों रोशनियों से अधिक उजाला दे जाता है, जब उसे जलाने के लिए पूरा परिवार एक साथ खड़ा हो।
इस दिवाली घरों को रोशन करने के साथ रिश्तों में भी उजाला भरने का संकल्प लें। शायद तभी आने वाली पीढ़ियां भी बड़े होकर कह सकेंगी कि हमारी बचपन वाली दिवाली भी कुछ ऐसी ही खूबसूरत थी।
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