महापुरुषों व शहीदों की प्रतिमाओं की नहीं हो रही देखरेख

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नमस्ते कोरबा :- प्रतिमाएं सम्मान की प्रतीक हैं। हर चौक, चौराहों पर किसी न किसी महापुरुष की लगी प्रतिमाएं हमको उनके कार्यों और बलिदानों को याद कराती हैं। शहर में लगी महापुरुषों की प्रतिमाओं की दुर्दशा को देखकर गौरवान्वित होने की बजाय शर्मिंदगी महसूस होती है। शायद अपने प्रतिमाओं की दशा को देखकर समाज और देश की खातिर अपना सब कुछ समर्पित करने वाले महापुरुषों की आत्मा भी यह सोचने को मजबूर हो जाए कि आखिर उन लोगों ने किस समाज/व्यवस्था की कल्पना को जेहन में रखकर लड़ाई लड़ी थी।

बुधवारी बाजार स्थित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा स्थापित है। सफेद रंग के पत्थर की इस प्रतिमा पर इतनी धूल चढ़ी है कि यह मूर्ति काली हो गई है। इस प्रतिमा के आसपास पसरी गंदगी बापू के स्वच्छता के सपनों को मुंह चिढ़ाता है। यह बात दीगर है कि शासन, प्रशासन के बड़े साहबों के अलावा लोकतंत्र के रहनुमाऔ को इसकी जानकारी ना हो लेकिन बापू के तीन बंदरों की तरह आंखें, कान और मुंह पर हाथ रखना ही मुनासिब समझते हैं।

निहारिका क्षेत्र में नेताजी की मूर्ति भी स्थापित कर दी गई है और बकायदा चौक का नाम भी सुभाष चौक कर दिया गया है। देश या शहर में कभी कोई बड़ी घटना होती है तो खुशी, शोक जताने या गुस्से का इजहार करने हर कोई नेताजी के शरण में पहुंचता है। दुखद तो यह कि सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा या इस स्थल की साफ-सफाई पर कोई ध्यान नहीं देता है। यह जगह बैनर, पोस्टरों और इश्तेहारों से पट गई है।

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