नमस्ते कोरबा :- कोरबा के पर्यावरण के प्रति जागरूक लोगों के द्वारा हसदेव के जंगलों को बचाने के लिए 24 तारीख को कलेक्टर कार्यालय के पास सुबह 11:00 बजे एक मानव श्रृंखला बनाकर राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार को संदेश देते हुए बताया जाएगा कि इन जंगलों की महती आवश्यकता क्यों है, मानव श्रृंखला की इस मुहिम को लोगों का सहयोग बेहतर ढंग से मिल रहा है और हर कोई अपने माध्यम से लोगों को इस मुहिम में जोड़ने का कार्य कर रहा है, इन जंगलों को बचाने का यह मौका अभी नहीं तो कभी नहीं की तरह है इसलिए इसमें कोरबा के आमजन राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को छोड़कर खुद से जुड़ रहे हैं,

*जाने हसदेव अरण्य को*
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य उत्तरी कोरबा, दक्षिणी सरगुजा व सूरजपुर जिले में स्थित एक विशाल व समृद्ध वन क्षेत्र है जो जैव-विविधता से परिपूर्ण हसदेव नदी और उस पर बने मिनीमाता बांगो बांध का केचमेंट है जो जांजगीर-चाम्पा, कोरबा, बिलासपुर जिले के नागरिकों और खेतो की प्यास बुझाता है. यह वन क्षेत्र सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नही बल्कि मध्य भारत का एक समृद्ध वन है, जो मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के जंगलो को झारखण्ड के पलामू के जंगलो से जोड़ता है. यह हाथी जैसे 25 अन्य महत्वपूर्ण वन्य प्राणियों का रहवास और उनके आवाजाही के रास्ते का भी वन क्षेत्र है.वनों की कटाई और खनन को लेकर, नो-गो हसदेव अरण्यवर्ष 2010 में स्वयं केन्द्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने सम्पूर्ण हसदेव अरण्य क्षेत्र में खनन को प्रतिबंधित रखते हुए नो-गो (No – Go) क्षेत्र घोषित किया था. कॉर्पोरेट के दवाब में इसी मंत्रालय के वन सलाहकार समिति (FAC) ने खनन की अनुमति नहीं देने के निर्णय से विपरीत जाकर परसा ईस्ट और केते बासन कोयला खनन परियोजना को वन स्वीकृति दी थी, जिसे वर्ष 2014 में ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने निरस्त भी कर दिया. हाल ही में Wil (भारतीय वन्य जीव संस्थान) की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई जिसमें बहुत ही स्पष्ट रूप से लिखा है कि हसदेव अरण्य समृद्ध, जैवविविधता से परिपूर्ण वन क्षेत्र है. इसमें कई विलुप्त प्राय वन्यप्राणी आज भी मौजूद हैं. वर्तमान संचालित परसा ईस्ट केते बासन कोल ब्लॉक को बहुत ही नियंत्रित तरीके से खनन करते हुए शेष सम्पूर्ण हसदेव अरण्य क्षेत्र को तत्काल नो गो घोषित किया जाये. इस रिपोर्ट में एक चेतवानी भी दी गई है कि यदि इस क्षेत्र में किसी भी खनन परियोजना को स्वीकृति दी गई तो मानव हाथी संघर्ष की स्थिति को संभालना लगभग नामुमकिन होगा. जिसके परिणाम प्रदेश में देखने में भी आ रहे है. आए दिन हाथियों के दल रिहायशी इलाकों में घुसने लगे है. जिससे भारी मात्रा में जान-माल की हानि भी हो रही है.

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हसदेव अरण्य में साल के वृक्षों का प्राकृतिक जंगल हैं जिनका आज तक पौधा रोपण संभव नहीं हो सका है. इस स्थिती में यदि एक बार ये जंगल काट दिए जाएँ तो इंसानों द्वारा उन्हें दोबारा नहीं उगाया जा सकता.









